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कक्षा - 11 वितान भारतीय गायिकाओं में बेजोड: लता मंगेशकर पाठ का सारांश प्रश्नोत्तर

  कक्षा - 11  पुस्तक  - वितान  पाठ - भारतीय गायिकाओं में बेजोड: लता मंगेशकर  पाठ का सारांश  प्रश्नोत्तर भारतीय गायिकाओं में बेजोड:          ...


 कक्षा - 11 

पुस्तक  - वितान 

पाठ - भारतीय गायिकाओं में बेजोड: लता मंगेशकर 

पाठ का सारांश 

प्रश्नोत्तर

भारतीय गायिकाओं में बेजोड:             लता मंगेशकर 

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कठिन शब्दों के अर्थ:--

त्रिताल या तीन ताल - यह सोलह मात्राओं का ताल है। इसमें चार-चार मात्राओं के चार विभाग होते हैं।              राग मालकौंस - भैरवी थाट का राग इसमें रे और प वर्जित हैं। इसमें सब स्वर कोमल लगते हैं। यह गंभीर प्रकृति का लोकप्रिय राग है। 

मध्य या द्रुतलय- लय तीन प्रकार की होतीहै- विलंबितलय (धीमी), मध्यलय (बीच की), द्रुतलय (तेज), मध्यलय से दुगुनी और विलंबितलय से चौगुनी तेज लय द्रुतलय कहलाती है।  

गानपन - जो गायकी एक आम इनसान को भी भावविभोर कर दे। स्वर मालिकाएँ - स्वरों की मालाएँ, स्वर मालिका में बोल नहीं होते। आघात - गायन या वादन के समय मात्राओं के अनुसार ताल का प्रयोग। जलदलय -  द्रुतलय (तेज) । 

लोच- स्वरों का बारीक प्रयोग। रंजक - दिल को लुभाने वाला। ऋतुचक्र -  कुछ राग ऋतुओं के अनुसार गाए जाते हैं। जैसे वसंत में राग वसंती वर्षा ऋतु में रागा मल्हार।

ध्वनि मुद्रिका - आवाज। पक्कापन - परिपक्वता। सूक्ष्मता - सूक्ष्म होने का भाव। समाविष्ट - समाया हुआ। अलक्षित अज्ञात, अदृश्य। अनभिषिक्त - जिसका विधिपूर्वक अभिषेक न हुआ हो।

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               पाठ का सारांश 

'भारतीय गायिकाओं में बेजोड़-लता मंगेशकर' लेखक कुमार गंधर्व द्वारा लिखित निबंध है। यह पाठ लता मंगेशकर के संगीत के प्रति लेखक के लगाव का वर्णन करता है। बहुत समय पहले लेखक ने बीमारी के दिनों में रेडियो पर एक गाना सुना था। उस गाने के अद्वितीय स्वर से लेखक हैरान रह गया। जब उसे पता चला कि यह गाना सुप्रसिद्ध गायक दीनानाथ मंगेशकर की बेटी लता मंगेशकर ने गाया था तो मन-ही-मन उसे एक संगति प्राप्त करने का अनुभव हुआ। उस समय से लेखक लगातार लता मंगेशकर के गाने सुनता आ रहा है। लता से पहले नूरजहाँ अपने संगीत के लिए बहुत प्रसिद्ध थी, लेकिन लता उनसे भी बहुत आगे निकल गई। संगीत के क्षेत्र में ऐसे चमत्कार होते रहते हैं, जैसे प्रसिद्ध सितारवादक विलायत खाँ अपने सितारवादक पिता से बहुत आगे निकल गए। संगीत में लता जोड़ की कोई भी गायिका नहीं है। उनके संगीत के कारण ही लोगों का शास्त्रीय संगीत के प्रति दृष्टिकोण बदला है। लता के संगीत जादू के कारण ही छोटे-से-छोटा बच्चा भी गीतों के स्वर को गुनगुनाने लग गया है। सामान्य मनुष्य की भी संगीत के प्रति रुचि बढ़ने का कारण लता का गानपन है।

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साधारण श्रोता शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा लता के गीतों में अधिक आनंद का अनुभव करता है। शास्त्रीय संगीत को समझने के लिए ताल, राग और लय की समझ होनी आवश्यक है। मनुष्य को तो संगीत की वह मिठास चाहिए, जो उसे आनंद की प्राप्ति दे। संगीत में माधुर्य हो तो मनुष्य उससे सीधे जुड़ जाता है। लता की आवाज़ में स्वरों की निर्मलता है। नूरजहाँ एक अच्छी गायिका थी, लेकिन उनके स्वरों में मादक उत्तान था। लता का जीवन के प्रति दृष्टिकोण ही उन्हें उनके गीतों के स्वरों से जोड़ता है इसलिए उनके गीतों के स्वर मधुर और कोमल है। लेखक के अनुसार संगीत निर्देशकों द्वारा लता की आवाज की निर्मलता का जितना उपयोग करना चाहिए था उतना किया नहीं है। लेखक को लगता है कि यदि वह संगीत निर्देशक होता तो वह उनसे कठिन-से-कठिन गीत गाने को देता। लता के गाने की एक विशेषता यह भी है कि वह गीतों को दो शब्दों के अंतर स्वरों का इस प्रकार प्रयोग करती है कि वे एक-दूसरे में खो जाते हैं। यह काम बहुत कठिन है लेकिन लता इस काम को बहुत सहज ढंग से करती है।

लेखक कहता है कि लता की करुण रस के गीतों पर पकड़ कम है। वह मुग्ध श्रृंगार के गीतों को जितनी उत्कटता के साथ गाती है, उतनी उत्कटता के साथ करुण गीतों को नहीं गा पाती। लेखक को लगता है कि संगीत निर्देशक उनसे ऊँचे स्वरों की प‌ट्टी में गीत गवाते हैं यह उनके गायन का दोष है या संगीत निर्देशक का यह कहना कठिन है। लेखक के अनुसार शास्त्रीय संगीत में लता के स्थान को निर्धारित करना व्यर्थ है क्योंकि शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में अंतर है। शास्त्रीय संगीत स्थायी भाव रूप में होता है तो चित्रपट संगीत चपलता के गुण को धारण करता है। चित्रपट संगीत गाने वाले को शास्त्रीय संगीत का ज्ञान होना आवश्यक है। वह ज्ञान लता को है। तीन घंटे तक शास्त्रीय संगीत की महफ़िल में बैठना और तीन-साढ़े तीन मिनट के चित्रपट गीत को सुनना, दोनों में एक-सा आनंद मिलता है। दोनों प्रकार के संगीत में अंत एक ही होता है- 'श्रोता को आनंद प्रदान करना'।

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संगीत के क्षेत्र में लता का स्थान खानदानी गायक के समान है। लता तीन घंटे की महफ़िल नहीं कर सकती, लेकिन उसके तीन मिनट के गीत को कोई प्रथम श्रेणी का गायक उस ढंग से नहीं गा सकता जैसे लता गा सकती है। खानदानी गायकों का यह आरोप है कि चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए हैं। लेखक के अनुसार चित्रपट संगीत ने तो लोगों के कानों को मधुर संगीत सुनाकर सुधार दिया है। सच तो यह है कि शास्त्रीय गायक संगीत के क्षेत्र में अपना एकाधिकार चाहते हैं। उन्हें चित्रपट संगीत से अपनी हुकुमशाही पर खतरा लगता है। बदलते समय के साथ श्रोता को शुद्ध नीरस शास्त्रीय संगीत में रुचि नहीं रही है। वह सुरीला और भावपूर्ण संगीत चाहता है। संगीत के क्षेत्र में यह क्रांति चित्रपट का संगीत ही लाया है। चित्रपट संगीत में बहुत कुछ नया करने की गुंजाइश है। चित्रपट संगीत में शास्त्रीय रागदारी, राजस्थानी, पंजाबी, बंगाली आदि प्रदेशों के लोकगीतों का बहुत प्रयोग किया है। इसके माध्यम से लोगों को देश की संस्कृति की जानकारी मिलती है। संगीत के क्षेत्र में प्रतिदिन नए प्रयोग हो रहे हैं, जिससे यह क्षेत्र अधिक विकसित हो रहा है। ऐसे चित्रपट संगीत की एकमात्र साम्राज्ञी लता है। इस क्षेत्र में और भी कई पार्श्वगायक और गायिकाएँ हैं, लेकिन लता जैसी लोकप्रियता किसी को नहीं मिली। संगीत के क्षेत्र में एक राग भी अधिक समय तक टिक नहीं पाता, परंतु लता आधी से अधिक शताब्दी से इस क्षेत्र में अपना स्थान बनाए हुए है। यह एक चमत्कार है कि लता का गाना भारत में ही नहीं विदेशों में भी पसंद किया जाता है। ऐसा कलाकार शताब्दियों में शायद एक ही होता है यह हमारा भाग्य है। कि हम उसे अपनी आँखों से घूमता-फिरता देख रहे हैं।

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पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर:--

प्रश्न 1. लेखक ने पाठ में गानपन का उल्लेख किया है। पाठ के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए बताएँ कि आपके विचार में इसे प्राप्त करने के लिए किस प्रकार के अभ्यास की आवश्यकता है?

उत्तर - लता संगीत के क्षेत्र की अनमोल धरोहर है। उन्होंने ने चित्रपट संगीत को ऊँचे शिखर पर पहुँचा दिया है। आज के युवक और युवतियाँ लता को ही प्रेरणा-स्रोत मानते हैं। लेखक के अनुसार लता के संगीत की अपनी विशेष पहचान है। लता अपने से पहली पार्श्व गायिकाओं और बाद की पार्श्व गायिकाओं से काफ़ी आगे हैं। लता के संगीत के जादू के कारण ही घर-घर में बच्चे भी गीतों को गुनगुनाने लगे हैं। लोगों का शास्त्रीय संगीत के प्रति दृष्टिकोण बदल गया है। लता के कारण ही संगीत के विविध प्रकारों से लोगों का परिचय हो रहा है; उनका स्वरों और तालों का ज्ञान बढ़ रहा है। गीतों में सुरीलापन क्या होता है- इसकी पहचान बढ़ रही है। साधारण लोगों को भी संगीत की सूक्ष्मता की समझ आने लगी है। नई पीढ़ी का संगीत उनके गीतों के कारण ही संस्कारित हो रहा है। संगीत की लोकप्रियता, उसके प्रसार और अभिरुचि के विकास का श्रेय लेखक ने लता को दिया है। हमारी राय भी लेखक से भिन्न नहीं है। लता का संगीत प्रत्येक व्यक्ति को उसके जीवन के निकट ला देता है। लता के संगीत की निर्मलता मनुष्य में नया उत्साह पैदा करती है। लता ने हर तरह के गीत गाए हैं; जैसे- भक्ति, देश-प्रेम, श्रृंगार, विरह आदि के गीत उनका हर गीत मनुष्य को भक्ति, देश-प्रेम; श्रृंगार और विरह से जोड़ता है। लता का एक गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' सुनकर तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखों में आँसू आ गए थे। आज भी हम जब यह गीत सुनते हैं, तो देश-प्रेम की भावना मन को छू जाती है; देश के याद आने लगता है। श्रृंगार रस के गीत मन में कई तरह की भावनाएँ पैदा करते हैं तथा पैरों में थिरकन होने लगती है। भक्ति के गीत मनुष्य को सीधे प्रभु की भक्ति से जोड़ते है। लता का प्रत्येक गीत मनुष्य को छू जाता है और वह गीतों के भावों के साथ स्वयं को जुड़ा हुआ अनुभव करने लगता है। लता के संगीत की ऊँचाइयों ने ही नई पीढ़ी को संगीत के क्षेत्र में भविष्य बनाने के मार्ग को खोला है। लता का संगीत ही स्वयं में एक विशेष अनुभूति देता है।

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प्रश्न 2. लेखक ने लता की गायकी की किन विशेषताओं को उजागर किया है? आपको लता की गायकी में कौन-सा विशेषताएँ नजर आती हैं? उदाहरण सहित लिखिए।

उत्तर - लेखक ने लता की गायकी की निम्नलिखित विशेषताओं को उजागर किया है :-

(1) लता की गायकी में अद्भुत सुरीलापन है। उनके सुरीले स्वर किसी के भी कानों में पड़ने लगें तो कोई सुननेवाला उसका अनुकरण करने का प्रयत्न करेगा। उनके सुरों में अ‌द्भुत मिठास, कोमलता, लोच तथा मतवालापन है।     

(ii) लता की गायकी की एक और विशेषता है, उनके स्वरों की निर्मलता। उनके स्वरों में कोमलता और मुग्धता है। उनके
गीतों को सुनकर ऐसा लगता है कि लता जी का जीवन को देखने का जो दृष्टिकोण है वह उनके गायन की निर्मलता में झलक रहा है।

(iii) लता की गायकी की तीसरी विशेषता है उनका नादमय उच्चारण। उनके गीत के कोई दो शब्दों का अंतर स्वरों के आलाप द्वारा बड़ी सुंदर रीति से भरा होता है। ऐसा प्रतीत होता है कि वे दोनों शब्द विलीन होते-होते एक दूसरे में मिल जाते हैं।

(iv) लता जी की गायकी में शास्त्रीय संगीत की शुद्धता तथा मधुरता का संगम भी देखने को मिलता है। चित्रपट संगीत गाने वाले को शास्त्रीय संगीत का ज्ञान होना आवश्यक है जो लता जी को हैं। वे अपने गायन में शास्त्रीयता तथा मधुरता का मेल करती हैं। मेरी दृष्टि में लता जी की गायकी में इन विशेषताओं के अतिरिक्त पवित्रता, लोच, तल्लीनता तथा मार्मिकता भी है।

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प्रश्न 3. लता के करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है, जबकि श्रृंगारपरक गाने वे बड़ी उत्कटता से गाती हैं इस कथन से आप कहाँ तक सहमत हैं ?

उत्तर :- 'लता ने करुण रस के गानों के साथ न्याय नहीं किया है, जबकि श्रृंगारपरक गाने वे बड़ी उत्कटता से गाती हैं- इस कथन से हम पूरी तरह सहमत नहीं हैं। लता जी ने हर तरह के गीत बड़ी लगन से गाए हैं। लता ने श्रृंगारपरक गीत बड़ी उत्कटता से गाए हैं ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि श्रृंगारपरक गीत मनुष्य को नए वातावरण से जोड़ते हैं। उसके मन में नई-नई भावनाएँ पैदा करते हैं। करुण रस के गीतों से मनुष्य सीधे नहीं जुड़ पाता। लता के स्वरों की कोमलता के कारण ऐसा लगता है कि करुण रस के गीत अच्छी तरह नहीं गाए हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। लता के ऐसे कई गीत हैं, जिन्हें सुनकर मन उदास हो जाता है। गीतों के भावों के उतार-चढ़ाव को वे इस ढंग से प्रयोग करती हैं कि सुनने वाले को लगता है मानो यह हमारे साथ ही हो रहा है। करुण रस के गीतों में लता ने एक माँ, बहन और प्रियतमा की सुंदर अभिव्यक्ति दी है। चित्रपट संगीत में लता के गीतों ने औरत के मनोभावों को अच्छी तरह से व्यक्त किया है 'रुदाली' फ़िल्म में एक औरत के मनोभावों को अच्छी अभिव्यक्ति दी है, सुनने वालों को औरत के मन से सीधा जोड़ता है। 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गीत आज भी जब सुना जाता है, लोगों की आँखें नम कर जाता है। ऐसे ही लता के कई गीतों में प्रियतमा की अपने प्रियतम से की अभिव्यक्ति लोगों को भी उदास कर जाती है। लता के लिए ऐसा कहना कि उन्होंने करुण रस के गीतों के साथ न्याय नहीं किया है, गलत है। लता का प्रत्येक गीत लोगों के जीवन से उसी प्रकार जुड़ा है जिस प्रकार गीत के स्वर, भाव तथा उतार-चढ़ाव होते हैं।

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प्रश्न 4. संगीत का क्षेत्र ही विस्तीर्ण है। वहाँ अब तक अलक्षित, असंशोधित और अदृष्टिपूर्व ऐसा खूब बड़ा प्रांत है तथापि बड़े जोश से इसकी खोज और उपयोग चित्रपट के लोग करते चले आ रहे हैं इस कथन को वर्तमान फ़िल्मी संगीत के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :- संगीत का क्षेत्र एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें प्रतिदिन नए रागों, नए यंत्रों तथा नई तालों का प्रयोग होता रहा है। लोग केवल वाद्य-यंत्रों का प्रयोग करके संगीत को नया रूप नहीं देते, अपितु प्रतिदिन प्रयोग में आनेवाली वस्तुओं से भी संगीत उत्पन्न कर लेते हैं। वैसे तो प्रकृति के हर रूप में संगीत है, लेकिन चित्रपट संगीत की बात ही अलग है। चित्रपट संगीत ने संगीत को विशिष्ट लोगों से निकालकर जनसाधारण के बीच में पहुँचा दिया है। चित्रपट संगीत ने लोगों को सुर, ताल, लय तथा भावों को समझने में मदद दी है। संगीत का क्षेत्र विस्तीर्ण है, जहाँ नित नई खोज और उपयोग हो रहे हैं। पहले चित्रपट का संगीत तैयार करने के लिए एक स्टूडियो बनाया जाता था जहाँ कई लोग काम करते थे। गायक और वाद्य यंत्र को बजाने वालो को कई बार रिहर्सल करनी पड़ती थी। एक गीत को रिकॉर्ड करने में कई-कई दिन लग जाते थे। उस गीत में संगीत निर्देशक, गीतकार, गायक तथा वाद्य यंत्रों को बजाने वालों की मेहनत नजर आती थी। लोकगीतों को उनके मौलिक रूप में प्रस्तुत किया जाता था; उनसे छेड़छाड़ नहीं की जाती थी। लेकिन वर्तमान समय में संगीत को देखने का नजरिया बदल गया है; यहाँ अब नित नए प्रयोग हो रहे हैं। पहले गीत को रिकॉर्ड करने में एक टीम वर्क होता था, लेकिन अब गीत को तैयार करने में पहले जितनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। अब इलेक्ट्रॉनिक्स वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है, जिससे गायक के एक बार ही गाए गीत को कई तरह के उतार-चढ़ावों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। आधुनिक संगीत में पहले के संगीत की तरह मौलिकता तथा मिठास नहीं है। इसका कारण संगीत में तरह-तरह के प्रयोग हैं। संगीत के साथ छेड़छाड़ करके उसके मौलिक स्वरूप को बिगाड़ दिया जाता है। पाश्चात्य संगीत की नकल पर भारतीय संगीत तेज धुनों का प्रयोग किया जाता है, जिसे लगातार सुना नहीं जाता। आज का संगीत नई पीढ़ी का संगीत है, जिसे आज सुना और कल भुला दिया। संगीत के नए जोश और प्रयोगों ने भारत में ही नहीं अपितु विदेशों में भी भारतीय चित्रपट संगीत को नया बाजार दिया है। जिससे लोग किसी भी तरह के गीतों के साथ छेड़छाड़ करके उसे नया रूप देकर बाजार में पेश करते हैं और नई पीढ़ी गीत की धुनों से प्रभावित होकर उसे अपने जीवन में उतार लेती है। वर्तमान संगीत ने संगीत की मिठास और लय को समाप्त कर दिया है।

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प्रश्न 5. चित्रपट संगीत में लोगों के कान बिगाड़ दिए-अकसर यह आरोप लगाया जाता रहा है। इस दर्ज कुमारगंधर्वायर अपनी राय लिखें।

उत्तर : - चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए हैं-लेखक के अनुसार यह आरोप गलत है। चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़े नहीं है अपितु उन्हें संगीत को समझने के नए अवसर दिए हैं। पहले जनसाधारण की संगीत के सुर, ताल और लय की समझ नहीं थी लेकिन अब गीतों में सुरीलापन क्या होता है, उन्हें समझ आने लगा है। उनका संगीत के स्वरों का ज्ञान बढ़ रहा है। साधारण मनुष्य भी संगीत की सूक्ष्मता को समझने लगा है। चित्रपट संगीत के कारण छोटे-छोटे बच्चे भी सुर और लय में गुनगुनाते दिखाई देते हैं। संगीत की लोकप्रियता, उसका प्रसार और अभिरुचि के विकास में चित्रपट संगीत का बड़ा हाथ है। लोगों का शास्त्रीय संगीत को देखने और समझाने का दृष्टिकोण बदला है। इसका श्रेय लेखक ने चित्रपट संगीत को दिया है।

'चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए हैं'- यह आरोप पहले के तेज संगीत की अपेक्षा आज के संगीत पर ठीक जान पड़ता है। आधुनिक संगीत में रस और मिठास का स्थान तेज धुनों और ऊँची आवाज में चीखते हुए स्वरों ने ले ली है। भारतीय संगीत को पश्चिमी संगीत में रंग दिया है, जिससे नई पीढ़ी पर संगीत का बुरा प्रभाव पड़ रहा है। आज चित्रपट संगीत मन को राहत देने के स्थान पर तेज दर्द पैदा करता है। आज का संगीत कानफोडू है, जिसे ज्यादा समय तक नहीं सुना जा सकता, इसलिए कहा जा सकता है कि पहले के चित्रपट संगीत की अपेक्षा आधुनिक चित्रपट संगीत ने लोगों के कान बिगाड़ दिए हैं।

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प्रश्न 6. शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीलों के महत्व का आधार क्या होना चाहिए ? कुमार गंधर्व की इस संबंध में क्या राय है? स्वयं आप क्या सोचते हैं ?

उत्तर :- कुमार गंधर्व के अनुसार शास्त्रीय एवं चित्रपट दोनों तरह के संगीतों के महत्व का आधार इस बात पर होना चाहिए कि संगीत के अंत में श्रोता को आनंद देने का सामर्थ्य किस गाने में है। शास्त्रीय और चित्रपट संगीत में रंजकता अर्थात मन मोहने वाली लय और ताल न हो, तो संगीत नीरस प्रतीत होगा। गाने में गानपन शास्त्रीय गायन के ताल-सुर के निर्दोष ज्ञान के कारण नहीं होता; उसके लिए श्रोता की पसंद की समझ होनी आवश्यक है। संगीत की सारी मिठास और ताकत उसकी रंजकता पर निर्भर है। सुनने वाले के समक्ष रंजकता का मर्म कैसे प्रस्तुत किया जाए; किस रीति से उसकी बैठक बिठाई जाए; श्रोताओं से कैसे सुसंवाद साधा जाए ये सभी तथ्य संगीत के महत्त्व का आधार है। इन तथ्यों के विना श्रोता और गायक दोनों को ही- चाहे शास्त्रीय संगीत हो या चित्रपट संगीत, आनंद की अनुभूति नहीं हो सकती क्योंकि संगीत का उद्देश्य तो लोगों को आनंद का परिचय करवाना है।
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