कक्षा-8 दीपकम् प्रथमः पाठ: - संगच्छध्वं संवदध्वम् पाठ का अनुवाद शब्दार्थ प्रश्नोत्तर अभ्यास कार्यम् Kaksha 8 Dipkam Prathmah path...
कक्षा-8
दीपकम्
प्रथमः पाठ: - संगच्छध्वं संवदध्वम्
पाठ का अनुवाद
शब्दार्थ
प्रश्नोत्तर
अभ्यास कार्यम्
Kaksha 8
Dipkam
Prathmah path: -
Sangachadhwam Samvaddhwam
Path ka anuvad
Shabdarth
Prashnottar
Abhyas karyam
पाठ: संगच्छध्वं संवदध्वम्
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पाठ का हिन्दी अनुवाद - सार
वैदिक वाङ्मय में वेदों का सर्वोच्च स्थान है। प्रस्तुत पाठ में कुछ वेदमन्त्रों को संगृहीत किया गया है जिनका सार इस प्रकार है-
तुम सभी अपने परिवार, राष्ट्र और समाज में मिलकर आगे बढ़ो और एकत्रित होकर कल्याण के लिए प्रयास करो। तुम परस्पर विचार विमर्श करते हुए एक स्वर से बोलो। परस्पर तुम्हारा मतभेद न हो।
एक ही कार्य में प्रवृत्त लोगों का एक समान चिन्तन हो। उनमें परस्पर मतभेद न हो। उनकी लक्ष्यसिद्धि भी एक समान हो। उनका मन भी समान हो।
अरे मनुष्यो ! तुम्हारा संकल्प समान हो। तुम्हारे हृदय एकरूप हों। तुम्हारा परस्पर विचार भेद न हो।
अरे मनुष्यो ! तुम्हारा
एकरूप हों। तुम्हारा परस्पर विचार भेद न हो
शब्दार्थाः - अस्माकम् - हमारा। वर्धापनानि - बधाई। प्रतिद्वन्द्विनः – प्रतिपक्षी। आम् - हाँ। पराजिताः – हार गए। क्रीडक - खिलाड़ी। सम्यक् - अच्छी मनोभेदः – फूट । उक्तम् - कहा है। प्रद्वत्तः – दिया प्रकार। गया। संगच्छध्वम् - मिलकर चलो। मिलित्वा – मिलकर। प्रख्यातम् - प्रसिद्ध ।
हिन्दी अनुवाद:--
- नमस्ते, आचार्य ! हमारे विद्यालय के खेल समारोह में फुटबॉल खेल में हमने विजय प्राप्त की है।
- बधाइयाँ, आपका अभिनन्दन है। क्या आप जानते हैं कि आप लोगों के प्रतिपक्षी कैसे हारे ?
- हाँ, 'जानता हूँ, आचार्य ! हमारे दल के खिलाड़ियों में परस्पर भली प्रकार सामञ्जस्य था, परन्तु विपक्षी दल में वह नहीं था।
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- सत्य है, आचार्य ! उस दल के खिलाड़ियों में परस्पर मनमुटाव तथा द्वेषभाव था। उन्होंने परस्पर सहयोग नहीं किया।
- इसलिए, बताओ। विजय प्राप्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक है?
- मिलकर कार्य करना, एकता और परस्पर मेल आवश्यक है।
- सत्य ही कहा है। यह संदेश ही वेद में 'संगच्छध्वं संवदध्वम्' इस प्रकार दिया गया है।
- आचार्य ! किस वेद से यह संदेश लिया गया है? और इसका अभिप्राय क्या है?
- ऋग्वेद में सज्ञान सूक्त का यह मन्त्रांश है। यह संघटन सूक्त के रूप में भी प्रसिद्ध है। आओ, हम इस सूक्त के प्रसिद्ध तीन मंत्रों को पढ़ते हैं।
शब्दार्थाः - ब्रह्ममुखः - ब्रह्मा के मुख से । निःसृता – निकली हुई । चत्वारः - चार। मन्यते - मानी जाती है। संहिताः – ग्रन्थ। विद्वद्भि -विद्वानों के द्वारा। परिधाय - पहनकर। पादत्राणम् - जूता । बहिः - बाहर। स्थापयित्वा - रखकर। समुपस्थिताः - उपस्थित। प्रणामाञ्जलिम् - हाथ जोड़कर। समवेतः - मिलकर। नेत्रे - आँखों को। मीलयित्वा - मूंदकर।
हिन्दी अनुवाद :--
प्राचीन भारतीय ज्ञान की परम्परा में वेद को साक्षात् ब्रह्मा के मुख से निकली हुई अत्यधिक पवित्र वाणी माना जाता है। वेद के चार ग्रन्थ हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये वेद आज विश्व के प्राचीनतम साहित्य के रूप में माने जाते हैं। आप सभी स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहनकर जूतों को बाहर रखकर इस प्रार्थना सभा में उपस्थित हैं। इसलिए आओ, हाथ जोड़कर, आँख बंद करके, एकाग्रचित्त से एक स्वर से वेद मन्त्रों का उच्चारण करते हैं ।
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मन्त्राणां भावार्थं जानीमः -
(1)
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १॥
शब्दार्थाः - संगच्छध्वम् - मिलकर चलो। संवदध्वम्
मिलकर बोलो। मनांसि - मन के विचार। पूर्वे- पूर्व काल में। संजानानाः कर्मों का मिलकर वहन करते हुए। उपासते - सेवन करते हैं।
हिन्दी अनुवाद : -
(अरे मनुष्यो!) मिलकर चलो, मिलकर बोलो। परस्पर मनोभावों को जानते हुए (कर्म करो)। जिस प्रकार पूर्वकाल में मिलकर कर्मों का वहन करते थे।
भावार्थ :-
इस मन्त्र का भाव यह है मनुष्यों को मिलकर चलना चाहिए और मिलकर एकरूप से बोलना चाहिए। इससे राष्ट्र, समाज और परिवार की उन्नति होती है। परस्पर मतभेद न हो। जिस प्रकार पूर्वकाल में देवता अपने-अपने भाग को मिलकर ग्रहण करते थे।
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(2)
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
शब्दार्थाः - मन्त्रः - विचार। समानम् - समान। अभिमन्त्रये - मन्त्रणा करता हूँ। हविषा - प्रार्थना के द्वारा। समितिः – लक्ष्य सिद्धि। समानी - समान। जुहोमि - ज्ञानयज्ञ करता हूँ।
हिन्दी अनुवाद : -
( हे मनुष्यों!) विचार एक समान हो, लक्ष्यसिद्धि एक समान हो। सभी (मनुष्यों) का मन एक समान हो। मैं तुम्हारे लिए समान विचार प्रकट करता हूँ और एक समान छवि (प्रार्थना) के द्वारा यज्ञ सम्पन्न करता हूँ।
भावार्थ : -
एक ही कार्य में साथ-साथ प्रवृत्त लोगों का चिन्तन एक समान हो ताकि लक्ष्यसिद्धि में कोई बाधा उपस्थित न हो। उनमें परस्पर सौहार्द की भावना रहे तथा उनमें विचार भेद न हो। वे सभी एक समान संकल्प वाले हों और समान विचार के साथ ज्ञान यज्ञ को सम्पन्न करें।
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(3)
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥३ ॥
शब्दार्थाः- आकूतिः –- संकल्प। समानाः समान। सुसहासति – सुसंगठित हो।
हिन्दी अनुवाद :-
(अरे मनुष्यो!) तुम्हारा संकल्प समान हो। तुम्हारे हृदय समान (विचार वाले) हों। तुम्हारा मन समान हो। जिससे तुम्हारा संघटन सुन्दर हो।
भावार्थ : -
मनुष्यों का संकल्प एक समान होना चाहिए, ताकि तुम्हारा संघटन सुन्दर हो, तुम्हारा कार्य सुन्दर हो। इस मन्त्र के द्वारा संगठित रूप से सह जीवन की प्रेरणा प्राप्त होती है।
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अभ्यास कार्य :--
प्रश्न 2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत ।
(क) सर्वेषां मनः कीदृशं भवेत् ?
(ख) सङ्ङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः?
(ग) सर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः?
(घ) अस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति ?
उत्तराणि : -
(क) सर्वेषां मनः समानं भवेत्।
(ख) अस्य अभिप्रायः अस्ति यद् मिलित्वा अग्रे गच्छत, एक-स्वरेण वदत।
(ग) सर्वे वैमनस्य परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः।
(घ) अस्मिन् पाठे एकतायाः प्रेरणां अस्ति।
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प्रश्न 3. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत ।
रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण करें।
(क) परमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति।
(ख) वयम् ईश्वरं नमामः।
(ग) वयम् ऐक्यभावेन जीवामः।
(घ) ईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते।
(ङ) अहं समाजाय श्रमं करोमि ।
(च ) अयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः।
(छ) वेदस्य अपरं नाम श्रुतिः।
(ज) मन्त्राः वेदेषु भवन्ति।
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उत्तराणि :--
(क) कः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति?
(ख) वयम् कम् नमामः?
(ग) वयम् कथम् जीवामः?
(घ) कस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते?
(ङ) अहं कस्मै श्रमं करोमि ?
(च) अयं पाठः कस्मात् सङ्कलितः?
(छ) कस्य अपरं नाम श्रुतिः ?
(ज) मन्त्राः केषु / कुत्र भवन्ति ?
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प्रश्न-5 पाठे प्रयुक्ततान् शब्दान् भावानुसारं परस्पर योग्यता।
उत्तराणि -
(क) संगछध्वम् मिलित्वा
(ख) संवदध्वम् एकस्वरेण
(ग) मनः चित्तम्
(घ) उपासते सेवन्ते
(ङ) वसूनि धनानि
(च) विश्वानि समस्तानि
(छ) आकूतिः संकल्प:
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