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कक्षा-8 दीपकम् द्वितीयः पाठ: अल्पानापि वस्तूनां संहति : कार्यसाधिका पाठ का अनुवाद शब्दार्थ प्रश्नोत्तर अभ्यास कार्य

कक्षा-8 दीपकम्  द्वितीयः पाठ:  अल्पानापि वस्तूनां संहति : कार्यसाधिका   पाठ का हिन्दी अनुवाद  शब्दार्थ   प्रश्नोत्तर  अभ्यास कार्यम् Kaksha-...


कक्षा-8 दीपकम् 

द्वितीयः पाठ: 

अल्पानापि वस्तूनां संहति : कार्यसाधिका  

पाठ का हिन्दी अनुवाद 

शब्दार्थ  

प्रश्नोत्तर 

अभ्यास कार्यम्

Kaksha-8 dipkam

Dvitiyah path:

Alpanapi vastunan sanhati : karyasadhika

Path ka hindi anuvad

Shabdarth  

Prashnottar

Abhyas karyam


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         द्वितीयः पाठ: 

अल्पानापि वस्तूनां संहति : कार्यसाधिका

(अल्प वस्तुओं का संगठन भी कार्य का साधक होता है।) 

               पाठ का हिन्दी अनुवाद 

संकेत :-- कानिचन  ........................ अवदत्।

शब्दार्थाः - कानिचन - कुछ। पुण्यः - धार्मिक। दर्शनाय - दर्शन के लिए। अगच्छन् - चल पड़े। तदानीम् - तब। आरोहन्तः- चढ़ते हुए। वृष्टिः – वर्षा। आरब्धा - आरम्भ हो गई। सहसा - अचानक। सर्वत्र – सभी जगह। प्राप्तवन्तः – पहुँच गए। प्रार्थयन्तः- प्रार्थना करने लगे। अस्मान् - हमें। अधैर्यम् - अधीरता। सान्त्वयन् – सान्त्वना देता हुआ। प्रसृतः – फैल गया। सेतुः - पुल। भग्नः -टूट गया। सञ्जातम् - हो गया। अक्रन्दन् - चिल्लाने लगे। प्रेरयन् - प्रेरित करता हुआ।

हिन्दी अनुवाद : -

कुछ मित्र विद्यालय के ग्रीष्म अवकाश में धार्मिक स्थानों के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखण्ड को चल पड़े। तब वर्षा का आरम्भ काल था। सभी गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुँच गए। जब वे श्री केदारधाम की ओर चढ़ रहे थे, तब लक्ष्य प्राप्ति से पहले वेग के साथ वर्षा आरम्भ हो गई। अचानक सभी जगह अंधकार फैल गया। नदी के जल के तेज बहाव से पुल टूट गया। पर्वत फिसल गया। सभी ऊँचे स्वर से चिल्लाने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे-'हे प्रभु! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो।' सभी की अधीरता को देखकर नायक सुधीर ने सभी को सान्त्वना देते हुए तथा प्रेरित करते हुए कहा-

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संकेतः--  अयि भो: ..............गमिष्यामः।

शब्दार्थाः - विपत्काले – संकट के समय । अवलम्ब्य आश्रय करके। चिन्तयामः - सोचते हैं। सन्निकटे – निकट ।गमिष्यामः – चलेंगे। चेत् - तब। विषादम् – चिन्ता। शान्ता – शान्त। सम्भूय - एकत्रित होकर। निर्माय – बनाकर । 

नायकः अरे मित्रों! इस संकट के समय हम धैर्य का सहारा लेकर कोई उपाय सोच लेंगे।

दिनेश – (चिन्ता के साथ) अरे भ्राता ! क्या कह रहे हो? हमारी मृत्यु ही निकट है। तब किस प्रकार उपाय सोचना चाहिए।

नायकः - मित्र ! चिन्ता न करो। जब वर्षा शांत (हो जायेगी) और वातावरण स्वच्छ हो जायेगा, तब हम एकत्रित होकर पुल और मार्ग का निर्माण करके पुनः अपने लक्ष्य की ओर चल पडेंगे।

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संकेत:-- एतस्यां........................श्रावस्ती ।

शब्दार्थाः- एतस्याम् - ऐसी। दुःसाध्यम् - अत्यधिक कठिन। सम्भूय - मिलकर। सम्भवति - सम्भव है। श्रावयामि – सुनाता हूँ। शक्नुमः - कर सकते हैं। सावधानम् - ध्यान से।

हिन्दी अनुवाद:--

सुरेश - इस स्थिति में क्या हम इस अत्यधिक कठिन कार्य को कर सकते हैं।

नायक - प्रिय मित्रो ! हम आत्मविश्वास के बल से इस असम्भव कार्य को भी मिलकर अवश्य सिद्ध कर सकते हैं। इससे हमारी लक्ष्य प्राप्ति और प्राणरक्षा भी होगी।

कपिल - क्या यह सम्भव है?

नायक - मित्र, अवश्य सम्भव है। इस प्रसंग में मैं हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।

सभी -(उत्कण्ठा से) क्या कथा है ? मित्र कहो ।

नायक - ध्यानपूर्वक सुनो।

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संकेत:-- अस्ति गोदावरीतीरे......भोजनेऽप्यप्रवर्तनम्। 

शब्दार्थाः - शाल्मली - सेमल। तरुः - वृक्ष। प्रच्छन्नः – गुप्त। सपरिवारः - परिवार सहित। निवसन्ति - निवास करते थे। कपोताः - कबूतर । अवलोक्य - देखकर। निर्जन जन रहित। वृद्धानाम् - बूढ़े लोगों का। ग्राह्यम्- ग्रहण करना चाहिए। आगत्य – आकर। विकीर्य - बिखेर कर। विस्तीर्य – फैलाकर । निरूप्यताम् - देखिए। सर्वथा - सदा। अविचारितम् - बिना विचार। श्रुत्वा - सुनकर। सदर्पम् - अभिमान के साथ। अप्रवर्तनम् - अप्रवृत्ति ।

हिन्दी अनुवाद:--

गोदावरी नदी के किनारे एक विशाल सेमल का वृक्ष था। वहाँ प्रतिदिन दूर स्थानों से आकर पक्षी निवास करते थे। एक बार वहाँ कोई शिकारी चावलों के दानों को बिखेर कर और जाल फैला कर छिपकर बैठ गया। उसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा परिवार सहित आकाश मार्ग से जा रहा था। कुछ कबूतर वन के मध्य चावलों के दानों को देखकर लालच में पड़ गए।

तब चित्रग्रीव चावलों के दानों से ललचाए कबूतरों को कहने लगा-"इस जनरहित वन में कहाँ, कैसे चावलों के दानें सम्भव हैं। यह विचार कर लीजिए। कोई शिकारी होगा। सदा बिना विचारे कार्य नहीं करना चाहिए।" यह वचन सुनकर कोई कबूतर घमंड के साथ कहने लगा-आह, यह किसलिए कहा गया है।

संकटकाल उपस्थित हो जाने पर ही वृद्ध लोगों का वचन ग्रहण करना चाहिए। सभी स्थानों पर विचार करने पर भोजन भी प्राप्त नहीं होता है।

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संकेत:-- तस्य वचनं......................... महात्मानाम्। 

शब्दार्थाः - अवज्ञाम् - तिरस्कार। भोक्तुम् - खाने के लिए। बद्धाः – बंध गए। अनागतः न आया हुआ। ज्ञातुम् - जानने में। विस्मयः - आश्चर्य। अभ्युदये उन्नति में। युधि - युद्ध में। प्रकृतिः – स्वभाव। अवतीर्य - उतरकर। अनन्तर – तब। तिरस्कुर्वन्ति स्म - कोसने लगे। अकृत्वा न करके। कापुरुष - कायर। सदसि - सभा में। पटुता – चतुरता। व्यसन - आदत। श्रुतौ – सुनो।

हिन्दी अनुवाद:--

उसके वचन को सुनकर चित्रग्रीव की अवहेलना करके सभी कबूतर पृथ्वी पर उतरकर चावलों के दानों को खाने लगे।

तब उस जाल में सभी कबूतर बंध गए। तब जिसके वचन से कबूतर वहाँ बँधे थे, उसे सब कोसने लगे। यह देखकर चित्रग्रीव कहने लगा- 'यह इसका दोष नहीं है।' न आई हुई विपत्ति को कौन जानने में समर्थ है? इसलिए इस संकट के समय में हमें इसका तिरस्कार न करके कोई उपाय सोचना चाहिए। क्योंकि संकट के समय उलाहना कायर व्यक्ति का लक्षण है। सज्जनों का लक्षण तो-

संकट में धैर्य, उन्नति होने पर क्षमा, सभा में वाणी को। कौशल, युद्ध में वीरता, यश के प्रति रुचि, वेदों के ज्ञान में अत्यधिक रुचि-यह महान् पुरुषों का स्वभाव सिद्ध है।

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संकेत:- अतोऽधुना..................उत्पतिता:।

शब्दार्थाः - अधुना – अब। प्रतीकारः – समाधान। सहतिः – समूह। एकचित्तीभूय - एकरूप होकर। उत्पतिताः - उड़ गए। अवलम्ब्य - सहारा लेकर। लघूनाम् – छोटी। आदाय – लेकर। उड्डीयताम् - उड़ चलो। विचार्य – विचार कर।

हिन्दी अनुवाद:--

इसलिए अब हमें धैर्य का सहारा लेकर समाधान सोचना चाहिए। प्रिय मित्रो ! छोटी वस्तुओं का समूह भी कार्य का साधक होता है- यह नीति का वचन लोकसिद्ध है। इसलिए हम सब एक रूप होकर जाल को लेकर उड़ चलें। यह सोचकर सभी पक्षी जाल को लेकर उड़ गए।

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संकेत:-- अनन्तरं............................. समायतः।

शब्दार्थाः - अपहारकान् - चुराने वाले। निवृत्तः लौट गया। पक्षिषु पक्षियों के। उक्तवन्तः कहने लगे। निवसति रहता है। तूष्णीम् - चुप। सम्भाषसे बोलता है। प्रत्यभिज्ञाय - पहचानकर। त्वरया - शीघ्र । पाशान्- फंदों को। छेत्स्यति- काट देगा। आलोच्य विचार कर। विवरः - बिल । अनिष्टः - संकट। शतद्वार - सौ दरवाजे। अवपातः - गिरना। निःसृत्य निकलकर। समायातः – आया है।

हिन्दी अनुवाद:--

तब वह शिकारी दूर से जाल को चुराने वालों को देखकर पीछे दौड़ा, परन्तु उसकी दृष्टि से पक्षियों के ओझल हो जाने पर वह लौट गया। तब शिकारी को लौटा हुआ देखकर कबूतर कहने लगे- "हे स्वामी! अब क्या करना उचित है?" चित्रग्रीव कहने लगा- "प्रिय कबूतरो ! हमारा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गण्डकी के किनारे चित्रवन में रहता है। वह हमारे बंधनों को दाँतों के बल से काट देगा।" यह विचार कर सभी हिरण्यक के बिल के पास गए। हिरण्यक भी सदा संकट की आशंका से बिल के सौ द्वार बनाकर रहता था। तब हिरण्यक कबूतरों के पतन के भय से चकित मौन ही खड़ा रहा। चित्रग्रीव कहने लगा-"अरे मित्र, हिरण्यक ! क्या हमारे साथ बात नहीं करोगे?" तब हिरण्यक उसके वचन को पहचानकर आनंद से शीघ्रतापूर्वक बाहर निकलकर कहने लगा- "अहा मैं भाग्यवान हूँ। मेरा प्रियमित्र चित्रग्रीव आया है।"

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संकेत:-- पाशबद्धान्..........................प्राणा: संरक्षित ।

शब्दार्थाः - स्थित्वा -  रूक कर। छेतुम् - काटने के लिए। सत्वरम् - शीघ्र। उपसर्पति - पास आता है। मद्ः - मेरा। आकर्ण्य -  सुनकर। प्रहृष्टमनाः - प्रसन्न मन। वात्सल्येन - प्रेम से। भगीरथ - महान्। अन्येषाम् - अन्य लोगों का। त्रैलोक्यस्य -  तीनों लोकों का। विमुक्ताः - मुक्त। सहर्षम् - प्रसन्नता के साथ। उड्डीय - उड़कर। प्रशंसन्ति - प्रशंसा करते हैं। श्रावयित्वा -  सुनाकर। सम्बोधयति – सम्बोधित करता है। आपद्ग्रस्ताः - संकट में फँसे। विहाय - छोड़कर। संलग्नाः - लगे हुए।

हिन्दी अनुवाद:--

बन्धन में बँधे कबूतरों को देखकर आश्चर्य के साथ पल भर रुककर कहने लगा- 'मित्र! यह क्या है?' चित्रग्रीव कहने लगा 'हे मित्र! यह हमारी विचारहीनता का फल है।' यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन को काटने के लिए शीर्घ पास आया। तब चित्रग्रीव कहने लगा-'मित्र! ऐसा नहीं। पहले मेरे आश्रित इनके बंधनों को काटो, पश्चात् मेरे।' यह सुनकर प्रसन्न मन वाला पुलकित होता हुआ हिरण्यक कहने लगा-साधु मित्र। साधु ! इस आश्रितों के प्रति प्रेम के कारण तुम तीनों लोकों के स्वामी होने के योग्य हो।' तब हिरण्यक अपने मित्रों के साथ उन कबूतरों के बंधनों को काटने लगा। सभी कबूतर बंधन से मुक्त हो गए। प्रसन्नता के साथ उड़कर आकाश के मार्ग से जाते हुए सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करने लगे-'आप की नीति - शिक्षा के द्वारा तथा नायक के धर्म के कारण हम सभी सुरक्षित हैं। हम धन्य हैं।

कथा को सुनाकर नायक सभी को सम्बोधित करने लगा-'अरे मित्रो ! संकट में फँसे कबूतरों ने बुद्धि बल के  द्वारा तथा संगठन के सामर्थ्य से आत्म रक्षा की। तब किस प्रकार हम संगठित होकर आत्मरक्षा नहीं कर सकते?' नायक के प्रेरक वचनों के द्वारा उत्साहित सभी भय, शोक तथा संदेह का त्याग कर पुल के निर्माण कार्य में लग गए। महान् प्रयासों के द्वारा पुल का निर्माण करके उन्होंने अपने प्राणों की तथा अन्य लोगों के प्राणों की ।

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