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कक्षा -10, पाठ - एक कहानी यह भी पाठ की व्याख्या, प्रश्नोत्तर

  कक्षा -10, पाठ - एक कहानी यह भी  कवि-  मन्नू भंडारी जी पाठ  की व्याख्या, प्रश्नोत्तर  kaksha -10, path - ek kahani yah bhi kavi- mannu bha...

 कक्षा -10,

पाठ - एक कहानी यह भी 

कवि-  मन्नू भंडारी जी

पाठ  की व्याख्या,

प्रश्नोत्तर 

kaksha -10,

path - ek kahani yah bhi

kavi- mannu bhandari ji

path ki vyakhya,

prashnottar




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     पाठ - एक कहानी यह भी 


जीवन परिचय :--

साहित्य जगत की सुप्रसिदध कहानी लेखिका मन्नू भंडारी का जन्म 2 अप्रैल, 1931 को भानपुरा, जिला मंदसौर, मध्य प्रदेश में हुआ था। बाद इसका परिवार अजमेर राजस्थान आकर रहने लगा। मन्नू भंडारी ने अपनी इंटरमीडिएट तक की शिक्षा अजमेर से पूरी की। स्नातक की परीक्षा मिरांडा हाउस में अध्यापन सारस विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण करने के बाद कुछ समय तक कोलकाता में अध्यापन कार्य किया। बाद में दिल्ली स्थित कार्य करते हुए सेवानिवृत्ति प्राप्त किया। सन 2021 में इनका देहांत हो गया। इनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए हिंदी साहित्य अकादमी का निखर सम्मान', राजस्थान संगीत नाटक अकादमी तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत किया गया है।

रचनाएँ :-- 

मन्नू भंडारी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं : -

कहानी - संग्रह : - एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, आँखों देखा झूठ, यही सच है, त्रिशंकु ।

उपन्यास:- बंटी, महाभोज।

पटकथाएँ - फिल्म एवं टेलीविजन धारावाहिकों के लिए रजनी, स्वामी, निर्मला, दर्पण आदि।

साहित्यिक विशेषताएँ

मनू भंडारी ने नयी कहानी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई है। इनकी रचनाओं में सामाजिक जीवन का यथार्थ चिंतन है। इन्होंने स्वी-मन से जुड़ी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति, पारिवारिक जीवन तथा विभिन्न वर्गों के जीवन की विसंगतियों को आत्मीय अभिव्यक्ति प्रदान की है।

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                        पाठ  का सार 

प्रस्तुत पाठ 'एक कहानी यह भी' मन्नू भंडारी द्वारा लिखा आत्मपरक शैली में 'आत्मकथ्य' है, जिसमें लेखिका ने उन व्यक्तियों और घटनाओं के बारे में लिखा है, जिन्होंने उसके लेखकीय जीवन को प्रभावित किया है। इस अंश में लेखिका के किशोर जीवन की घटनाओं के साथ उसके पिता जी और उसके कॉलेज की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का नाम विशेष रूप से उभर कर आया है। लेखिका द्वारा एक साधारण लड़की के असाधारण बनने के आरमिक पड़ावों को प्रकट किया गया है। इसके अलावा सन 1946-47 की आजादी की लड़ाई में उसकी भागीदारी, उत्साह, ओज, संगठन समता और विपक के तरीके का प्रभावपूर्ण वर्णन है।

पिता जी और माँ - लेखिका बताती है कि उसका जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा में हुआ लेकिन उसे याद है कि अजमेर में जहाँ पिता रहते थे वहाँ अव्यवस्थित  ढंग से फैली पुस्तकों, पत्रिकाओं के बीच पिता जी कुछ-न-कुछ पढ़ते रहते थे या उन्हें डिक्टेशन देते रहते थे। सबकी इच्छाओं और पिता जी की आशाओं का पालन करती हुई बेपदी माँ रहती थी। पिता जी अजमेर से पहले जब इंदौर में रहते थे वहाँ उनकी प्रतिष्ठा थी। वे कांग्रेस के साथ समाज सुधार कार्यों में लगे रहते थे। वे केवल शिक्षा के उपदेश न देकर विद्यार्थियों को अपने घर पढ़ाया भी करते थे। इस तरह उनकी दरियादिली के खूब चर्वे होते थे। एक ओर वे बेहद कोमल और संवेदनशील थे तो दूसरी ओर बेहद क्रोधी और अहंवादी थे।

अजमेर में हाशिए पर पिता जी - आर्थिक संकट के कारण पिता जी इंदौर से अजमेर आ गए। यहाँ आकर उन्होंने अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश (विषयवार) के अधूरे कार्य को पूरा किया, जिससे यश और प्रतिष्ठा तो बहुत मिली किंतु अर्थ नहीं मिला। गिरती हुई आर्थिक स्थिति ने उन्हें निचोड़कर रख दिया। अर्थिक विषमता का प्रभाव बच्चों पर न पड़े, इसका हमेशा प्रयास करते रहे। दूसरी ओर अभावों की ओर खिसकते जाने के कारण उत्पन्न क्रोध माँ पर बरसता । अपनों के हाथों गहरी चोट खाए पिता जी का विश्वास शक्की हो गया। इतना शक्की स्वभाव कि उसकी चपेट में हम सब (लेखिका आदि) आ जाते थे।

लेखिका के व्यक्तित्व पर उसके पिता का प्रभाव - लेखिका बताती है कि पिता जी के अनजाने, अनचाहे व्यवहार ने मेरे अंदर हीन ग्रंथियों को जन्म दि गोरा रंग पिता जी की कमजोरी थी। मैं काली थी और मुझसे दो साल बड़ी, खूब गोरी, बहन सुशीला से मेरी हर बात में तुलना करते हुए उसकी करते थे, जिससे मेरे हृदय में हीन भाव की ग्रचि पैदा हो गई कि नाम, सम्मान, प्रतिष्ठा पाने के बावजूद भी आज तक उससे उबर नहीं पाई। यही है कि हीन भावना के रहते अपनी किसी उपलब्धि पर भरोसा नहीं कर पाती है। आज भी उनके शक्की स्वभाव की झलक अपने अंदर दिखाई देती वह अतीत आज भी भीतर जड़ जमाए बैठा है।

लेखिका की माँ - लेखिका की माँ, पिता जी के स्वभाव के ठीक विपरीत थी। उसमें धैर्य और सहनशक्ति अपेक्षा से भी अधिक थी। पिता जी की ता ज्यादती को अपना भाग्य और बच्चों की हर उचित-अनुचित फरमाइश और जिद को सहजभाव से पूरा करती थी। उन्होंने जिंदगी भर अपने लिए कुछ नो माँगा, न चाहा, केवल दिया ही। सभी भाई-बहनों का लगाव उनकी सहानुभूति के कारण उन्हीं के प्रति था। इतने पर भी उनका त्याग, उनकी सहिष्णुत मेरे लिए आदर्श न बन सका।

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पड़ोस और परिवार - लेखिका याद करती है कि अपने जमाने में घर की दीवारें पड़ोस तक फैली रहती थीं। सभी परिवार के हिस्से होते थे। बचपन में खेले जाने वाले खेल की सीमा परिवार की दीवारें थीं और यह सीमा संपूर्ण पड़ोस तक जाती थी। अपने बचपन के समय के पड़ोस कल्चर को याद कर महानगरों के फ्लैट कल्चर को देख सकून मिलता है कि वे दिन कितने अच्छे थे। उसकी अपनी कहानियों के पात्र वे ही हैं जिनके साथ किशोरवस्या की यादें जुड़ी हैं। इतने वर्ष बीत जाने पर भी उनकी भाव-भंगिमा उनकी भाषा विना किसी प्रयास के बड़े सहज भाव से कहानियों में उतरते चले गए। लेखिश बताती है कि उस समय के दा साहब 'महाभोज' में इतने वर्षों बाद कैसे एकाएक जीवित हो उठे, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय था।

लेखिका को अपने वजूद का एहसास -  लेखिका बताती है कि बड़ी बहन की शादी हो जाने और दोनों बड़े भाइयों के पढ़ाई के लिए चाहर चले जाने पर अपने वजूद का एहसास हुआ। पिता जी यद्यपि मेरी योग्यताओं और क्षमताओं को रसोई तक सीमित करना चाहते थे, किंतु पर में आए दिन राजनेत पार्टियों के जमावड़ा की बहस सुनने का अवश्य अवसर देते थे। उन चर्चाओं में पार्टियों की नीतियों और आपसी विरोध, मतभेद तो समझ में आते। थे किंतु देशभक्त शहीदों की कुर्बानियों की चर्चाओं से मन जरूर आक्रांत रहता था।

प्राध्यापिका शीला आग्रवाल ने दायरा बढ़ाया - कॉलेज के फस्र्ट ईयर में प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से मेरा परिचय हुआ। उन्हेंनि साहित्य-संसार में प्रोश करने की प्रेरणा दी और देवरा बायक भरतेज प्रबंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवती चरण वर्मा के साहित्य को पढ़ती गई और शीला अग्रवाल के बहस करती हुई उस उम्र में जितना समझ सकती थी उतना समझा।

देश की स्थितियों को जानने-समझने का जो सिलसिला पिता जी ने शुरू किया था उसे शीला अग्रवाल जी ने सक्रिय भागीदारी में बदल दिया। वैसे भी सर '46-'47 के दिनों में घर बैठे रहना संभव नहीं था। प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस, भाषण हर शहर का चरित्र था और पूरे दमखम के साथ इनसे जुड़ना हर युवा का उन्माद था। में भी युवा थी और शीला अग्रवाल की जोशीली बातों ने रगों में बहते खून को लावे में बदल दिया। एक ओर शहर में बवंडर मचा हुआ था तो दूसरी ओर मेरे घर में। में हड़तालें कराती, नारे लगवाती, सड़कें नापती, यह सब पिता जी को अच्छा नहीं लगता। पिता जी के क्रोध की चिंता किए बिना उलटा उनसे बहसें करने लगी, फिर यह सिलसिला शुरू हो गया। राजेंद्र के साथ शादी करने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा।

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प्रिंसिपल का पत्र पिता जी के लिए - मेरे कॉलेज से पिता जी के लिए पत्र आया कि आप आकर मिलें और बताएँ कि मेरी गतिविधियों के कारण अनुशासनात्मक कार्यवाही क्यों न की जाए? पत्र पढ़ते ही पिता जी आग बबूला हो गए और कहने लगे यह लड़की मुझे कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगी। गुस्से में भन्नाते हुए गए थे। मैं डर के कारण पड़ोस में जाकर बैठ गई। लौटकर आए थे तो खुश थे कहाँ तो पिता जी जाते समय मुँह दिखाने से घबरा रहे थे और कहाँ बड़े गर्व से कहकर आए कि यह तो पूरे देश की आवाज है... इस पर कोई कैसे रोक लगा सकता है। बेहद गद्गद् होकर पिता जी सुनाते रहे और मैं अवाक् थी। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।

पिता जी के दो मित्रों की चर्चा के केंद्र में मैं - एक बार आज़ाद हिंद फौज के मुकदमे के सिलसिले में कॉलेजों, स्कूलों, दुकानों के लिए हड़ताल का आहवान था। छात्रों का एक बड़ा समूह लोगों को हड़ताल के लिए प्रेरित कर रहा था। अजमेर के चौपड़ बाज़ार पर विद्यार्थी इकट्ठे होकर भाषणबाजी कर रहे थे। इसी बीच पिता जी के एक दकियानूस मित्र ने आकर उनसे मेरे बारे में कुछ बातें- 'मन्नू की मत मारी गई है हड़तालें करवा कर हुड़दंग मचा रही है। ....' कह कर चले गए। वे तो आग लगाकर चले गए। पिता जी सारे दिन क्रोधित होते रहे। इस सबसे बेखबर में घर लौटी तो पिता जी के बेहद अंतरंग मित्र और अजमेर के सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित डॉ. अंबालाल जी बैठे थे, उन्होंने मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया। "मैं तो चौपड़ बाज़ार में तुम्हारा भाषण सुनते ही भंडारी जी को बधाई देने चला आया था। ... क्या तुम घर में घुसे रहते हो भंडारी जी...।" वे धुँआधार तारीफ़ करते जा रहे थे, पिता जी के चेहरे पर गर्व के भाव आते जा रहे थे। भीतर जाने पर माँ ने गुस्से वाली बात बताई तो मैंने राहत की साँस ली।

डॉक्टर साहब की प्रशंसा का कारण - लेखिका याद कर रही है कि उस समय उस उम्र में कैसा भाषण रहा होगा? यह तो डॉ. साहब का स्नेह था जो प्रशंसा बनकर बह रहा था। यह भी हो सकता है कि आज से पचास वर्ष पहले किसी लड़की का बेझिझक धुआँधार बोलते जाना उनकी प्रशंसा का कारो रहा होगा, किंतु पिता जी कितने ही तरह के अंतर्विरोधों में जीते थे। वे एक ओर अपनी विशिष्ट उवि बनाने की लालसा रखते थे तो दूसरी ओर अपनी सामाजिक छवि के प्रति सजग भी रहते थे।

कॉलेज की ओर से अनुशासनात्मक कार्यवाही - कॉलेज प्रशासन ने एक ओर लड़कियों को भड़काने और कॉलेज का अनुशासन बिगाड़ने के आरोप में शीला अग्रवाल को मई '47 में नोटिस थमा दिया तो दूसरी ओर हुड़दंग न मचे-इसलिए जुलाई में थर्ड इयर की क्लासेज बंद करके दो-तीन छात्राओं का प्रवेश निषिद्ध कर दिया। फिर तो कॉलेज के बाहर रहकर हुड़दंग मचाया। कॉलेज वालों ने अगस्त में थर्ड इयर खोल दिया। जीत की खुशी हुई परंतु चिर प्रतीक्षित खुशी के सामने यह खुशी कम थी। चिर प्रतीक्षित खुशी थी 15 अगस्त, 1947 की खुशी।

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          पाठ से सम्बन्धित शब्दार्थ 

निहायत - पूरी तरह से। भग्नावशेष - खंडहर, टूटे-फूटे हिस्से  बेहद - बहुत अहंवादी-घमंडी, दरियादिली परोपकार की उत्कट भावना । आर्थिक झटका - धन - हानि। बलबूते-सामर्थ्य पर। अर्थ - धन। विस्फारित - बढ़ना,और अधिक फैलना। हाशिए पर - किनारे पर, जहाँ सम्मान कम हो। यातना - कष्ट । विश्वासघात - धोखा, विश्वास को चोट पहुँचाना। आँखें मूँदकर - बिना विचारे ।

चपेट में आना - दबाव में आना। गौरव - गान - प्रशंसा करना। ग्रंथि - गाँठ । हीनभाव - छोटा समझना, महत्वहीन समझना। गड़ने - शर्म से अधिक संकोच होना । तुक्का से - भाग्य से, संयोग से। भन्ना जाना- क्रोधित होना। व्यया - कष्ट । आसन्न - अति समीप । जड़ जमाना -अस्तित्व स्थापित होना। ज्यादती-अत्याचार । फरमाइश - इच्छा । सहिष्णुता - सहनशीलता । पैतृक - पुराण - पिता से संबंधित बातें।

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दायरा - सीमा। विच्छिन्न - अलग - अलग करना, तोड़ देना। नए सिरे से शुरू से। बजूद - प्रभाव। आए दिन - प्रतिदिन ।आक्रांत - दुखी । दमखम - पूरी ताकत । निषिद्ध - जिस पर रोक हो।  वर्चस्व - दबदबा, प्रभाव । आग - बबूला - गुस्सा ।  कहर बरपा - मुसीबतों का आना। गुबार - गुस्से की अधिकता । अवाक - हैरान, मौन । हकीकत - सच्चाई 

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दकियानूसी - परंपराओं में विश्वास रखने वाला । आग लगाकर - भडकाकर। थू-थू करके चले गए - अपमान करना । अतरंग - आत्मीय। अभिन्न  मित्र-घनिष्ठ दोस्त ।

         पाठ्य-पुस्तक से प्रश्नोत्तर 

प्रश्न- लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पडा ?

उत्तर- लेखक के व्यक्तित्व पर दो लोगों का प्रभाव पड़ा-उसके पिता जी का प्रभाव :-  लेखिका के जीवन में पिता जी का ऐसा प्रभाव पड़ा जिससे उसके मन में हीनता की ग्रंथि वन गई जिससे वह कभी उबर नहीं पाई। यह कैटा लेखिका के मन की और आत्मविश्वास को हिलाकर रख देती थी।

पिताजी ने ही उसमें देश-प्रेम की भावना जगाई थी।

प्राध्यापिका भीला अग्रवाल का प्रभाव :-  शीला अग्रवाल ने साहित्य और अपनी जोशीली बातों से, लेखिका की अंकुरित देश-प्रेम की भावनाएँ विस्तृत शाखाओं के रूप में फैले विशाल वृक्ष जैसी वन गई और चल पड़ी वह आंदोलन के रास्ते पर। परिणाम यह हुआ कि हड़ताल, भाषण आदि में उनका ही नेतृत्व रहने लगा।

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प्रश्न 2 . इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को 'भटियारखाना' कहकर क्यों संबोधित किया है?

उत्तर -  पिता जी के विचार में रसोई तक लड़की को सीमित कर देना उसकी प्रतिभा को कुंठित कर देना है, जिसमें रहकर अपनी प्रतिभा के प्रयोग का अनुकूल समय नहीं मिलता है। इसलिए पिता जी नहीं चाहते थे लेखिका रसोई तक सीमित रहे।

पिता जी की दृष्टि में रसोई एक ऐसा भटियारखाना है जहाँ भट्टी सुलगती ही रहती है, किसी-न-किसी के लिए कुछ बनता ही रहता है। वहाँ काम करते हुए योग्यता के अनुकूल कार्य करने, सोचने का समय नहीं मिलता है।

प्रश्न 3 . वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर ?

उत्तर- लेखिका के पिता को एक पत्र मिला जिसमें प्रिंसिपल ने मन्नू के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने की बात लिखी थी। यह पढ़कर उसके पिता बहुत नाराज हुए। पिता जी को जब पता चला कि कॉलेज में बेटी का बहुत प्रभाव है। सारी लड़कियों पर इतना रौब है कि उसके बिना लड़कियों क्लास में भी नहीं जातीं। प्रिंसिपल को कॉलेज चलाना मुश्किल हो गया है। यह जानकर पिता जी गौरवान्वित हो उठे। यह सब सुन लेखिका आश्चर्यचकित थी।

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प्रश्न 4. लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।

                         अथवा

मन्नू भंडारी और उसके पिता के बीच मतभेद के दो कारण लिखिए।

उत्तर -  लेखिका के पिता जी लेखिका को घर की चारदीवारी में रखकर देश और समाज के प्रति जागरूक तो बनाना चाहते थे, किंतु एक निश्चित सीमा तक। वे नहीं चाहते थे वह आंदोलनों में भाग ले, हड़ताल कराए या लड़कों के साथ सड़क नापती फिरे, किंतु लेखिका ने वह सब किया जो पिता जी नहीं चाहते थे। फलस्वरूप वैचारिक टकराहटें बढ़ीं।

लेखिका के लिए अब यह स्वीकार नहीं कि पिता जी उसकी स्वतंत्रता की सीमाओं को इतना संकुचित कर दें जिसमें घुटन हो। अतः दोनों में टकराहट बढ़ी।

प्रश्न 5. इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।

उत्तर - स्वाधीनता आंदोलन के समय लोगों में इतना उत्साह था कि ऐसे माहौल में घर में बैठना संभव नहीं हो रहा था। इसी समय प्राध्यापिका शीला अग्रवाल की जोशीली बातों से लेखिका को प्रेरणा मिली। देश-प्रेम की भावनाओं ने जो पिता जी की भागीदारी से स्थान बना लिया था वो भावनाएँ फूट पड़ीं और चल पड़ीं उसी आंदोलन की राह पर। सभी कॉलेजों, स्कूलों, दुकानों के लिए हड़ताल का आह्वान किया। जो-जो नहीं कर रहे थे, छात्रों का एक बहुत बड़ा समूह वहाँ-वहाँ जाकर हड़ताल करवाता। जगह-जगह भाषण देना, हाथ उठाकर नारे लगवाना, हड़तालें करवाना आदि में लेखिका अपनी सक्रिय भूमिका निभा रही थी।

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           रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 6. लेखिका ने बचपन में अपने भाइयों के साथ गिल्ली-डंडा तया पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियों ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।

उत्तर -  यद्यपि लेखिका लड़कों वाले खेल लड़कों के साथ खेलती थी, तथापि उसका दायरा सीमित था। परिवार और परिवार से हटकर पड़ोस, जो परिवार का ही हिस्सा होता था। पड़ोस तक फैली हुई घर की चारदीवारी से बाहर नहीं।

आज परिस्थितियाँ पूर्णतः भिन्न हैं। उस समय के पड़ोस से बिलकुल भिन्न हैं, पड़ोसियों से कोई संबंध नहीं है। लड़कियाँ पड़ोस एवं माता-पिता की दृष्टि से दूर लड़कों के साथ खेलती हैं और खेल सकती हैं, पर गिल्ली-डंडा नहीं, अन्य खेल। ये खेल उस संस्कृति से भिन्न हैं। आज लड़कियाँ प्रतिस्पर्धात्मक खेल खेलती हैं जिसके लिए परिवार प्रोत्साहित करता है। परिणाम यह है कि लड़कियों खेल के क्षेत्र में लड़कों से आगे हैं। वे टेबिल-टेनिस, हॉकी, दौड़ आदि खेलों में बिना किसी संकोच के रुचि ले रही हैं।

प्रश्न 7 . मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः 'पड़ोस कल्चर' से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में अपना विचार लिखिए। 

                          अथवा

महानगरों की 'फ्लैट-कल्चर' और लेखिका मन्नू भंडारी के 'पड़ोस कल्चर' में क्या अंतर दिखाई देता है? विचार करते हुए लिखिए।

उत्तर -  'पड़ोस-कल्चर' मनुष्य के जीवन में अहम भूमिका निभाता है। आदर्श के जितने मापदंड होते हैं वे प्रायः पड़ोस की देन होते हैं। परस्पर समूह का बोध पड़ोस से ही होता है। सहानुभूति और सहयोग की भावना का उदय पड़ोस से ही होता है। बड़ी-से-बड़ी विपन्नावस्था में मनुष्य धैर्य बनाए रखता है, क्योंकि पड़ोस उसे टूटने नहीं देता, निराश नहीं होने देता। कोई व्यक्ति अकेले होने का अनुभव नहीं करता है।

इसके विपरीत महानगरों की फ्लैट संस्कृति ने लोगों को पड़ोस की संस्कृति से अलग कर दिया है। वह अकेला है, असुरक्षित है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि फ्लैट में परिवार के साथ रहते हुए भी अपने बंद कमरे तक सीमित हो गया है। व्यस्तता इतनी है कि सामान्य बातें-कुशलता पूछने जैसी परंपरा को भी भूलता जा रहा है।

अतः वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि पड़ोस संस्कृति अपेक्षाकृत फ्लैट संस्कृति से अच्छी थी। मनुष्य के सर्वांगीण विकास में पड़ोस की जितनी भूमिका होती है उतनी अन्य किसी की नहीं।

प्रश्न 8. लेखिका दुद्वारा पड़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासो को अपने पुस्तकालय में खोजिए।

उत्तर -  पाठ के अनुसार लेखिका दुद्वारा पढ़े गए उपन्यास निम्नलिखित हैं-

1. सुनीता

2. शेखरः एक जीवनी

3. नदी के दवीप

4. त्याग-पत्र

5. चित्रलेखा ।

छात्र अपने विद्यालय के पुस्तकालय से इन उपन्यासों को खोजें तथा पढ़ें। साहित्य पढ़ने से साहित्य के प्रति रुचि बढ़ती है। साहित्यिक प्रतिभा का विकास होता है। अतः पठनीय पुस्तकें पढ़ें।

प्रश्न 9. आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिखिए।

उत्तर - यद्यपि परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी नहीं है, किंतु अनुभवों को लिखकर लेखन-प्रवृत्ति में वृद्धि कर सकते हैं। अतः छात्र स्वयं अपने अनुभवों को लिखने की शुरूआत करें।

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