आरोह - 1 कक्षा -11 पाठ घर की याद कवि भवानी प्रसाद मिश्र कवि-परिचय व्याख्या प्रश्नोत्तर aaroh - 1 Class -11 path ghar ki yad kavi bhav...
आरोह - 1
कक्षा -11
पाठ घर की याद
कवि भवानी प्रसाद मिश्र
कवि-परिचय
व्याख्या
प्रश्नोत्तर
aaroh - 1
Class -11
path ghar ki yad
kavi bhavani prasad mishr
kavi-parichay
vyakhya
prashnottar
पाठ - घर की याद
कवि - भवानी प्रसाद मिश्र
कवि - परिचय
सहज लेखन और सहज व्यक्तित्व के स्वामी श्री भवानी प्रसाद मिश्र राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहनेवाले आस्थावादी कवि थे। उन्होंने हिंदी कविता को सरलता और सरसता का गुण प्रदान किया था। उनका जन्म मध्यप्रदेश राज्य के होशंगाबाद के टिगरिया गाँव में सन 1913 में हुआ था तथा देहांत सन् 1985 में हुआ था। हिंदी साहित्य में विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन का शिखर सम्मान, दिल्ली प्रशासन का गालिब पुरस्कार दिया गया था। भारत सरकार के द्वारा उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया था। उन्होंने गांधी-साहित्य के हिंदी खंडों का संपादन कर कविता और गांधी जी के बीच सेतु बाँधने में योगदान दिया। सन 1942 से 1945 ई० तक भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने अत्यधिक योगदान दिया। इन्हें अनेक बार अंग्रेजी सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा तथा जेल-यात्रा की यातना सहन करनी पड़ी।
स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद मिश्र जी ने समाज सेवा एवं समाज सुधार का पथ ग्रहण किया। अपने इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए विचार, महिलाश्रम जैसी सामाजिक पत्रिकाओं का काफ़ी लंबे अर्से तक संपादन कार्य किया। 1958-72 ई० तक इन्होंने गांधी के समग्र साहित्य को हिंदी में अनूदित करने का कार्यभार संभाला। मिश्र जी का यह कार्य विशेष प्रशंसनीय है। सन 1972 ई० से मिश्र जी महात्मा गांधी प्रतिष्ठान के त्रैमासिक 'गांधी मार्ग' तथा सर्व सेवा संघ के 'भूदान यज्ञ' का संपादन कार्य प्रारंभ किया।
रचनाएँ - मिश्र जी के प्रकाशित संग्रह निम्नलिखित हैं- गीत-फरोश, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, गांधी पंचशती, बुनी हुई रस्सी तथा खुशबू के शिला-लेख।
सम्पूर्ण कविता की सप्रसंग व्याख्या :--
(1)
आज पानी गिर रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
रातभर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
घर कि मुझसे दूर है जो,
घर खुशी का पूर है जो,
शब्दार्थ :-- तिर रहा - तैर रहा। खुशी का पूर - खुशी से भरा।
प्रसंग - प्रस्तुत पंक्तियाँ भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता 'घर की याद' से ली गई हैं। अंग्रेज सरकार ने कवि को असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए कारावास भेज दिया था। सावन की घनघोर घटाओं से निरंतर वर्षा हो रही है। कवि को घर की याद व्यथित करने लगती है। उसके मन में घर के प्रति संवेदना बढ़ती जाती है।
व्याख्या : - कवि कहता है कि आज बादलों से निरंतर पानी बरस रहा है। लगातार बहुत पानी बरस रहा है। आज यह वर्षा पूरी रात हो रही है। जैसे-जैसे वर्षा का पानी गिरता जा रहा है वैसे-वैसे ही कवि का हृदय और उसके प्राण घर की स्मृतियों से घिरते जा रहे हैं। इस घनघोर वर्षा के समय में अपना घर कवि की आँखों में तैर आया है अर्थात घर की स्मृतियाँ आँखों में उभर आई हैं। वह घर जो अब कवि से बहुत दूर है जिसमें संपूर्ण खुशियाँ समाई हुई थीं आज वही घर इस वर्षा में रह-रहकर कवि को याद आ रहा है।
(2)
घर के घर में चार भाई ,
मायके में बहिन आई ,
बहिन आई बाप के घर ,
हाय रे परिताप के घर !
घर कि घर में सब जुड़े हैं ,
सब कि इतने कब जुड़े हैं ,
चार भाई चार बहिनें ,
भुजा भाई प्यार बहिनें ,
शब्दार्थ :- मायका - पिता का घर। परिताप- दुख । भुजा – बाजू ।
व्याख्या :-- कवि घर को याद करता है तो परिजनों की स्मृति उभर आती है। कवि के घर में चार भाई हैं। वह सोच रहा है कि मायके से बहन पिता के घर खुशियाँ बाँटने आई होंगी परंतु यहाँ आकर जब उसे भाई के जेल में होने का समाचार मिला होगा तो वह भी दुखी हो गई होगी। सबको कवि के लिए व्यथित देखकर यही खुशियों से भरा घर उसके लिए दुखों का घर बन गया होगा। कवि कहता है कि घर में सब इकट्ठे हुए होंगे। ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं जब सभी इकट्ठे हो पाते हैं। चार बहनें और चार भाई सभी मिलकर बैठे होंगे। भाई रक्षा करनेवाली भुजाओं के समान है तो बहनें उन भुजाओं पर बँधे प्यार की भाँति हैं। कवि को अपने भाइयों और बहनों का प्रेम याद आ रहा है जिससे वह दुखी हो रहा है।
(3)
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी ,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा,
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
शब्दार्थ:- बिन पढ़ी - अनपढ़ । गढ़ी बनाया। स्नेह-धारा प्रेम की धारा। पसारा – विस्तार।
प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियाँ 'घर की याद' कविता में से अवतरित हैं। इसके रचयिता भवानी प्रसाद मिश्र हैं। कवि को अंग्रेज्ज सरकार द्वारा तीन वर्ष की कारावास की सजा दी गई है। जेल में बैठा कवि घर को याद कर व्यथित हो रहा है। उसकी स्मृतियों में माँ का चेहरा उभर आता है।
व्याख्या :-- कवि कहता है कि मेरी माँ अनपढ़ है। उसे पढ़ना-लिखना नहीं आता। ऐसा लगता है कि उसे दुखों ने ही बनाया है अर्थात माँ ने जीवन में दुख ही अधिक पाए हैं। अपनी माँ को याद करता हुआ कवि कह उठता है कि उसकी गोद में सिर रखकर उसे दुखों का कोई आभास ही नहीं होता था। कहने का भाव यह है कि माँ की शांति देनेवाली आनंदप्रदायिनी गोद में कवि को सुख का अनुभव होता था उसे दुखों का पता ही नहीं चलता था। कवि का मानना है कि माँ की प्रेम की धारा इतनी विस्तृत है कि वह इस कारावास तक फैली हुई है अर्थात माँ दूर होते हुए भी अपने हृदय से उसे आशीर्वाद देती हुई स्नेह लुटाती रहती है। कवि कहता है कि माँ अनपढ़ है उसे लिखना नहीं आता इसी कारण माँ का पत्र उसे प्राप्त नहीं हो पाता।
( 4 )
पिता जी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
शब्दार्थ :-- क्षण - पल। व्यापा- व्याप्त होना, भीतर से महसूस होना। खिलखिलाएँ - खुलकर हँसे। हिचकें – संकोच करें, भयभीत हों। बिचकें - डरें। बोल - आवाज। झंझा तूफ़ान। लरजता – काँपता।
प्रसंग :- प्रस्तुत अवतरण भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता 'घर की याद' से अवतरित है। जेल में बैठे कवि की स्मृतियों में पिता की छवि उभरने लगती है। स्मृतियों के माध्यम से ही वह यहाँ पिता के व्यक्तित्व को अंकित करता है।
व्याख्या :- पिता को याद करता हुआ कवि कहता है कि उसके पिता में युवाओं जैसा उत्साह है। उन्हें एक क्षण के लिए भी कभी बुढ़ापे का अनुभव नहीं हुआ। युवाओं जैसी शक्ति उनके अंदर विद्यमान है। उनकी शक्ति और स्फूर्ति में कभी कोई कमी नहीं आई है। वे बलशाली होने के कारण अभी भी खूब दौड़ लगा सकते हैं। वे युवकों की तरह खिलखिलाकर हँसते हैं। कवि वर्णित करता है कि उसके पिता निडरता की साक्षात प्रतिमा हैं। वे मौत के सामने आ जाने पर भी भयभीत नहीं होते। शेर के आगे भी वे डरने वाले नहीं हैं। उनकी आवाज में बादलों की गरज के समान बल और गंभीरता है। काम करने में वे गतिशील हैं। आँधी के प्रचंड वेग की तरह वे काम करते हैं और मार्ग में आनेवाले विघ्नों से विचलित नहीं होते।
(5)
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे,
हाय, पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है,
शब्दार्थ:- दंड – एक प्रकार का व्यायाम। मुगदर – व्यायाम में प्रयोग किया जाने वाला लकड़ी का गदा । नैन – नेत्र ।
प्रसंग :- प्रस्तुत अवतरण भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता 'घर की याद' में से अवतरित है। कारागार में बंद कवि के मन में पिता की स्मृतियाँ चलचित्र की भाँति सामने आ रही हैं। कवि ने पिता की धार्मिक प्रवृत्ति एवं शरीर सौष्ठव का वर्णन किया है।
व्याख्या :- कवि अपने पिता के बारे में बताता हुआ कहता है कि आज भी उन्होंने सुबह नियमानुसार गीता का पाठ किया होगा। उसके पश्चात दो सौ साठ दंड निकालकर मुट्ठी में मुगदरों को पकड़कर हिलाते हुए खूब व्यायाम किया होगा। व्यायाम करने के बाद जब वे नीचे आए होंगे तो मुझे याद कर उनकी आँखों से आँसू बह निकले होंगे। अन्य बहन, भाइयों में मुझे न पाकर वे रो पड़े होंगे। कवि व्यथित होते हुए कहता है कि आज बहुत पानी बरस रहा है। पानी के बरसने के साथ-साथ ही आँखों में घर की स्मृतियाँ तैर रही हैं।
(6)
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।
पिता जी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर
शब्दार्थ :- क्षण - पल। व्यापा - व्याप्त हुआ।
प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियाँ भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता 'घर की याद' में से अवतरित हैं। कवि को कारावास में बैठे-बैठे घर की याद व्यथित कर रही है। अपने बहन-भाइयों और पिता की स्मृतियाँ उसके हृदय में उभर रही हैं।
व्याख्या :- कवि सोच रहा है कि पिता गीता-पाठ और व्यायाम के पश्चात जब नीचे आए होंगे तब चारों भाई और चारों बहनें वहाँ या तो खड़े होंगे या प्यार से खेल रहे होंगे। भाई भुजाओं के समान हैं तो बहनें भुजाओं पर बँधे प्यार के समान हैं। पिता ने उन खेलते हुए भाई बहनों को देखा होगा। वे पिता जिन पर एक क्षण भी बुढ़ापा व्याप्त नहीं हो पाया अर्थात जिनमें युवाओं जैसी शक्ति और उत्साह है वे अपने पाँचवें पुत्र को वहाँ न पाकर रो पड़े होंगे और पाँचवें पुत्र का स्मरण कर उनका हृदय व्यथित हो गया होगा और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली होगी।
(7)
पाँचवां मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिता जी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेटे,
क्योंकि मैं उनपर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा,
शब्दार्थ :- अभागा - भाग्यहीन। स्वर्ण - सोना।
प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियाँ भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता 'घर की याद' में से अवतरित हैं। कारावास में बैठे कवि के मन में घर और पिता की स्मृतियाँ उभर आती हैं। उसे ये स्मृतियाँ आहत करती हैं। यहाँ कवि अपनी उन्हीं यादों का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या :- पिताजी के द्वारा कहे गए वचन कवि को याद आ रहे हैं। उसे स्मरण हो आता है कि पिता अपने चारों पुत्रों को सोना मानते थे उसे अर्थात स्वयं कवि को सोने पर सुहागा माना करते थे। पिता की दृष्टि में उनका पाँचवाँ पुत्र बड़ा भाग्यवान था। वे उससे अत्यंत प्यार करते थे। कवि को लगता है कि आज कारावास में होने के कारण वह भाग्यहीन हो गया है। कवि स्वयं को अभागा इसलिए भी मानता है क्योंकि वह पिता की छत्रछाया से दूर यहाँ कारावास के एकांत में बैठा है। कवि को लग रहा है कि जब पिता ने अपने चारों पुत्रों को देखा होगा और पाँचवाँ पुत्र उन्हें याद आया होगा उस समय उन्हें अपने सोने के समान लगने वाले चारों पुत्र गौण लगे होंगे, क्योंकि सोने पर सुहागा कहा जाने वाला पाँचवाँ पुत्र अर्थात कवि तो भाग्यहीन बनकर जेल में बंद है। यह सोच कर पिता को अत्यंत कष्ट हुआ होगा।
(8)
और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा,
आँख में किसलिए पानी
वहाँ अच्छा है भवानी
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है,
शब्दार्थ :- पानी - अनु। लीक - परंपरा
प्रसंग :- प्रस्तुत अवतरण कविता 'घर की याद' में से अवतरित है। यह कविता कवि ने जेल में बैठकर लिखी। इसमें कवि के हृदय के मनोभाव उजागर हुए हैं। कवि को लग रहा है कि उसे दूर कारावास में देखकर पिता व्यथित हो रहे होंगे, तब माँ ने ही उन्हें ढांढस बंधाया होगा।
व्याख्या :- कवि यहाँ वर्णित करता है कि जब पिता उसे याद कर रो पड़े होंगे तब माँ ने ही उन्हें समझाया होगा। पिता को समझाते-समझाते माँ के हृदय के भीतर समाया दुख भी बह निकला होगा। वे पिता से कह रही होंगी कि तुम व्यर्थ में अश्रु क्यों बहा रहे हो। हमारा पुत्र भवानी वहाँ अवश्य ही अच्छा होगा। यदि वह आज कारावास में गया है तो ये सब तुम्हारी ही शिक्षाओं का फल है। देश और परिवार को अपना जानकर ही उसने कारावास को चुना है। उसका ऐसा करना उचित ही था। तुम भी तो अपने देश पर जान देने की परंपरा को निभाते हो। उसने तो तुम्हारी ही परंपरा को कायम रखा है। देश के लिए बलिदान देने की परंपरा को उसने टूटने नहीं दिया है, यहाँ कवि की माँ कवि के पिता को ढाँढस बंधाते हुए उन्हें व्यथित न होने के लिए कहती है।
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे,
पिता जी ने कहा होगा,
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
शब्दार्थ :- कच्चे - धीरज छोड़ना। धीर - धीरज ।
प्रसंग : - प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता भवानी प्रसाद मिश्र हैं। जब कवि को असहयोग आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेजी सरकार द्वारा कारावास की सजा दी गई तब कवि ने कारावास में रहते हुए यह कविता 'घर की याद' लिखी। कवि की स्मृतियों में यह चित्र उभर रहा है कि पिता उसे याद कर व्यथित हो रहे होंगे तो उस समय माँ ने उन्हें दिलासा दी होगी।
व्याख्या :- कवि को लग रहा है कि माँ पिता जी को इस समय ढाँढ़स बंधाते हुए कह रही होंगी कि यदि हमारा पुत्र देश के सम्मान की रक्षा हेतु कारावास जाने से डर जाता, वह अपने कदम पीछे हटाता तो ऐसा करके वह अनुचित कार्य ही करता। उसके इस कार्य से मेरी कोख लज्जित हो जाती। आज उसने अपने कर्तव्य को पूरा कर हमारा मान ही बढ़ाया है। माँ पिता को समझाती हुई कहती है कि यदि तुम इस तरह धैर्य खोकर रो पड़ोगे तो तुम्हें देख बाकी बच्चे भी रोने लगेंगे। कवि के समक्ष स्मृति चित्र उभर रहा है कि माँ की बात सुनकर पिता जी ने अपना सारा दुख भीतर ही भीतर सहते हुए उत्तर दिया होगा कि मैं कहाँ रो रहा हूँ। मैं कभी धीरज नहीं खोता। यहाँ कवि स्पष्ट कर रहा है कि पिता उसकी माँ से अपने अश्नु और अपना दुख छिपाने का प्रयास कर रहे होंगे।
( 10)
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है,
शब्दार्थ :- सजीले - हरियाली से सजे। पुण्य पावन पवित्र ।
प्रसंग :- प्रस्तुत पंक्तियाँ भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा कारावास में रचित कविता 'घर की याद' में से अवतरित हैं। घर से दूर कवि के हृदय में परिजनों को याद उभर आती है जो उसके मन को आहत कर देती है। कवि कालिदास की मेघदूत परंपरा के अनुसार सावन को संदेशवाहक बनाकर अपने घर भेजता है।
व्याख्या :- कवि कारावास से बरसते हुए सावन को संबोधित करता हुआ कहता है कि हे हरियाली से सजे-धजे सावन। तुम बड़े ही पवित्र और पुष्प स्वरूप वाले हो। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे घर जाकर खूब बरसो। तुम्हारा बरसना मुझे स्वीकार है। परंतु इतना करना कि मेरे माता-पिता के नेत्र मुझे याद कर न बरसें। उन्हें मेरी सुख-शांति का संदेश देना। वे अपने चारों पुत्रों के बीच प्रसन्नता का अनुभव करें। वे अपने पाँचवें पुत्र के लिए कभी न तरसें। हे सावन ! तुम उन्हें जाकर मेरा कुशलक्षेम बताते हुए कहना कि मैं यहाँ पर ठीक हूँ वे मेरी चिंता बिलकुल न करें। मैं बहुत मज़े में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। केवल एक ही कमी है कि मैं घर पर नहीं हूँ। मुझे बस घर के बीच न होने की कमी ही है। इसके अतिरिक्त मैं यहाँ सब सुख भोग रहा हूँ। कवि सावन से आग्रह करता है कि तुम मेरे माता-पिता से यह कह देना कि मेरी मानसिक यातनाओं की अब 'बस' अर्थात पराकाष्ठा हो गई है। जेल की इस पीड़ा को सहते हुए मुझे सब कुछ रसहीन लगने लगा है। ये सब मेरे माता-पिता से कभी न कहना। उन्हें मेरे खुश होने का ही संदेश देना। इन अंतिम पंक्तियों में कवि की अंतर्व्यथा उभरकर सामने आई है।
(11)
किंतु उनसे यह न कहना,
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पड़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग कहना,
मत करो कुछ शोक कहना,
शब्दार्थ:- धीर - धीरज । शोक - दुख ।
प्रसंग :- प्रस्तुत पद्यांश 'घर की याद' कविता में से अवतरित है। इसके रचयिता भवानी प्रसाद मिश्र हैं। कवि ने यहाँ कालिदास की मेघदूत परंपरानुसार सावन को संदेश देकर अपने घर अपने माता-पिता को उसका कुशलक्षेम बताने के लिए भेजा है।
व्याख्या :- कवि सावन से आग्रह करता है कि उसके घर जाकर माता-पिता को उसका कुशलक्षेम ही बताना। जेल में झेली जा रही मानसिक यातनाओं के बारे में उनसे कुछ मत कहना। उन्हें धैर्य बँधाते रहना। उन्हें बताना कि मैं जेल में भी लिख रहा हूँ। मेरा लेखन और पठन-पाठन कार्य चल रहा उन्हें कहना कि मैं निरंतर कार्य करने में लगा रहता हूँ। मैं पढ़-लिखकर ज्ञानार्जन कर रहा हूँ। मैं उन्हीं के नाम को रोशन कर रहा हूँ। यहाँ के सभी लोग मुझे बहुत चाहते हैं और मुझसे अच्छा व्यवहार करते हैं। हे सावन ! तुम उनसे जाकर कहना कि वे मेरे दूर होने का दुख न करे, मैं यहाँ पर कुशलपूर्वक और मजे से जीवन बिता रहा हूँ।
(12)
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
शब्दार्थ:- व्यस्त - लीन । ठेलता – दूर भागता ।
प्रसंग :- प्रस्तुत अवतरण भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रचित कविता 'घर की याद' में से अवतरित है। यहाँ कवि को कारावास में बैठे-बैठे घर की तथा अपने परिजनों की याद सताने लगती है। कवि सावन को अपनी कुशलक्षेम का संदेश देने के लिए अपने घर भेजता है।
व्याख्या :- कवि सावन को संबोधित करता है कि हे सावन ! तुम मेरे घर जाकर मेरे माता-पिता से कहना कि मैं यहाँ पर मस्ती में जीवन बिता रहा हूँ। गांधी जी की परंपरानुसार मैं सारा दिन चरखा कातने में लीन रहता हूँ। मेरे स्वास्थ्य के बारे में बताते हुए यह अवश्य कहना कि मैं यहाँ पर ढेर सत्य भोजन करता हूँ जिससे मेरा वजन सत्तर सेर हो गया है। मैं यहाँ पर कूदता और खेलता रहता हूँ। कवि कहना चाहता है कि मैं जेल में बेफिक्र जीवन बिता रहा हूँ। मैं दुखों को अपने पास फटकने नहीं देता। मैं उन्हें दूर धकेल देता हूँ। हे सावन ! तुम उन्हें मेरी कुशलता का ही समाचार सुनाना। ये मत कहना कि जेल में रहते रहते मेरा मन और शरीर अस्त होने लगा है अर्थात् मेरा शरीर और मेरा मन ढलने लगा है। कवि अपने माता-पिता से छिपाना चाहता है कि पौष्टिक भोजन न मिलने के कारण जहाँ उसका शरीर कमजोर हो गया है वहीं उचित वातावरण के अभाव में मानसिक यातनाओं के कारण मन भी रुग्ण हो गया है।
(13)
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ,
कह न देना मौन हूँ मैं,
खुद ना समझें कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरखें।
शब्दार्थ :- मौन - उदास, चुपचाप । बक - कह। सजीले - सजे हुए। पावन - पवित्र।
प्रसंग :-- प्रस्तुत अवतरण 'घर की याद' कविता में से अवतरित है। यह कविता कारावास में भवानी प्रसाद मिश्र द्वारा रची गई थी। कावि को माता-पिता की याद आहत करती है तो वह सावन को संदेश देकर अपने घर भेजता है। कवि सावन से वास्तविकता न कहने के लिए आग्रह करता है।
व्याख्या:-- कवि सावन को संबोधित करता हुए कहता है- हे सावन। तुम माता-पिता से जाकर मेरी कुशलता का ही समाचार देना। उन्हें वह सब कुछ मत बताना जिन परिस्थितियों को मैं वास्तविकता में भोग रहा हूँ। यह न कह देना कि मैं रात-रातभर जागता रहता हूँ। दुखों के कारण मेरी नींद ही उड़ गई है। अब तो मानसिक यातनाएँ इतनी बढ़ गई हैं कि मैं आदमी का सामना ही नहीं करना चाहता। मैं तो किसी भी आदमी का सामना करने से डरने लगा हूँ। ये कदापि मत बताना कि मैं चुपचाप रहता हूँ। मेरा किसी से बोलने का मन नहीं करता। यहाँ मानसिक यातनाओं को सह-सह कर मैं तो अपने ही अस्तित्व को भूलने लगा हूँ। कवि सावन को दृढ़ता से समझाते हुए कहता है कि तुम मेरे माता-पिता के सामने जाकर कुछ भी असलियत न बताना। इस बात का विशेष ध्यान रखाना। अपनी बात को इस ढंग से अभिव्यक्त करना कि उन्हें किसी प्रकार कोई शक न होने पाए कि तुम झूठ बोल रहे हो। हे हरियाली से भरे सजे हुए पवित्र सावन । तुम मेरे घर जाकर खूब बरसना। तुम्हाला बरसना मुझे स्वीकार है। इस बात का ध्यान रखना कि मुझे याद कर मेरे माता-पिता की आँखों से अनु न बरतें। वे अपने चारों पुत्रों के साथ खुरा रहे न आए। उन्हें अपने पाँचवें पुत्र के लिए तरसना न पड़े।
पाठ्यपुस्तक के प्रश्नोत्तर
कविता के साथ :--
प्रश्न 1. पानी के रातभर गिरने और प्राण-मन के घिरने में परस्पर क्या संबंध है?
उत्तर - कवि जेल में है। वर्षा हो रही है। कवि को उसके घर से दूर होने की पीड़ा साल रही है। उसे परिवारवालों की याद आ रही है। जिस प्रकार मेघ आकाश में घिरकर वर्षा ला रहे हैं। उसी प्रकार कवि का मन यहाँ तक कि उसके प्राण भी परिवार की स्मृतियों से घिर गए हैं। जैसे-जैसे पानी रातभर लगातार गिरता जा रहा है वैसे-वैसे कवि के हृदय में भी अपने प्रियजनों की स्मृतियाँ चलचित्र की भाँति निरंतर उभरती जा रही हैं।
प्रश्न 2. मायके आई बहन के लिए कवि ने घर को परिताप का घर क्यों कहा है?
उत्तर - कवि सोच रहा है कि उसकी बहन यहाँ मायके में आनंद और खुशियाँ बाँटने आई होगी परंतु कवि के जेल में होने के कारण घर के सभी सदस्य दुखी होंगे। जब उसे इस बात का पता चलेगा तो वह भी दुखी हो जाएगी। वह तो खुशियाँ पाने के लिए मायके आई थी परंतु भाई के न मिलने पर वही घर उसके लिए दुखों का घर बन गया होगा।
प्रश्न-3 पिता के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं को उकेरा गया है ?
उत्तर- कवि ने एक ओर तो पिता के मजबूत शरीर सौष्ठव और उनके साहस का वर्णन किया है तो दूसरी ओर उनके हृदय की कोमलता का भी निरूपण किया है। कवि पिता के भी पूरी क्षमता के साथ दौड़ सकते हैं, खिलखिला सकते हैं। साहस तो उनचे के पिता पर बुढ़ापे का कोई कार तो क्या मौत को देखकर भी न हिचकिचाएँ, उनकी आवाज में बादलों जैसी गर्जना है तो काम में तूफानों जैसी गतिकताका पाठ करना उनकी धार्मिक प्रवृत्ति का परिचायक है तो दंड बैठक करना, मुगदर हिलाना उनके व्यायाम के कारण बने मजबूत शरीर केत दर्शाता है। उनका हृदय इतना कोमल है कि ते अपने बच्चों में कवि को न पाकर रो पड़ते हैं। उनके हृदय में कवि के प्रति चिंता बनी रहती है।
प्रश्न 4. निम्नलिखित पंक्तियों में "बस" शब्द के प्रयोग की विशेषता लिखिए।
मैं मजे में हूँ सही है
घर नहीं हूँ बस यही है
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से बस विरस है,
उत्तर - कवि ने यहाँ 'बस' शब्द का विविध अर्थों में प्रयोग किया है। इसी शब्द से कवि के विविध भाव स्पष्ट होते हैं। पहले 'बस' में कवि अपने पिता तथा अन्य परिवारजनों को सांत्वना देना चाहता है कि वह जेल में बिलकुल ठीक है, मजे में है। बस यही कमी है कि वह घर में नहीं है। दूसरे 'बस' में कवि के मन की आकुलता एवं पीड़ा का अनुभव होता है कि कहने को तो उसने सावन से कह दिया कि घर जाकर कह दे कि उसे यहाँ बस घर की ही कमी सताती है पर वास्तविकता यह है कि कवि अपनों से दूर रहकर बहुत व्याकुल है। अब तो उसकी सहनशक्ति की मानो चरमसीमा हो गई है। वास्तव में अब उसे सब कुछ रसहीन लगता है। अंतिम 'बस' द्वारा कवि की आशावादिता का संकेत मिलता है कि जब घरवालों को उसका संदेश मिल जाएगा कि वह जेल में मज्जे से है तो घर के लोग जो खुशियों के रस से वंचित हो चुके हैं, शायद फिर से खुश हो सकें।
प्रश्न 5. कविता की अंतिम 12 पंक्तियों को पढ़कर कल्पना कीजिए कि कवि अपनी किस स्थिति व मनःस्थिति को अपने परिजनों से छिपाना चाहता है ?
उत्तर - कवि अपने परिजनों से दूर जेल में रहकर बहुत व्याकुल है। उसे घर की याद सताती है। वह सावन से याचना करता है कि वह उसके घर जाकर उसकी कुशलता का संदेश परिवारवालों को दे। कवि सावन से कहता है कि वह परिवारवालों से कहे कि वह जेल में खुश है, खूब कूदता है, खेलता है, और खाता है, उसे कोई कमी नहीं है, वह यहाँ मस्त है। कवि वास्तव में अपनी असलियत को छिपाना चाहता है, वह नहीं चाहता कि परिवारवालों को यह पता चले कि वह यहाँ जेल की यातनाएँ सह रहा है। उसका शरीर और मन ढलने लगा है। रात-रात भर वह जागता है यहाँ तक कि अब तो वह आदमी से डरकर उसका सामना भी नहीं करना चाहता। अधिकतर वह मौन ही रहता है। वह तो जेल में रहकर अपने अस्तित्व को ही भूल चुका है। कवि अपनी वास्तविकता को छिपाकर सावन से उनके सुख और कुशलता का संदेश ही परिवार के लोगों को सुनाने का आग्रह करता है ताकि उन्हें कोई दुख न हो। उनकी आँखों में कवि को याद कर आँसू न उभर आएँ।
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