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युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति एवं रोकने के उपाय yuvaon mein nashe ki badhti pravritti evm rokne ke upay

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yuvaon mein nashe ki badhti pravritti evm rokne ke upay 


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युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति

                 एवं 

          रोकने के उपाय 


• विज्ञान ने अनेक प्रकार की पीड़ाहारी दवाइयों की खोज इसलिए की थी, ताकि उनसे मानव-जीवन सुखमय हो सके; अत्यंत जटिल और कटिस ऑपरेशन भी बिना पीड़ा के संभव हो सकें। लेकिन समाज ने इन्हीं दवाइयों को भौतिकवादी नशे के रूप में स्वीकार कर लिया है, जिससे मानव ने अपने सर्वनाश का रास्ता स्वयं खोल लिया है। आज का युवा वर्ग नशीली दवाइयों के चक्रव्यूह में इस भाँति उलझ चुका है कि उसका इससे छुटकारा पाने का कोई आसार दिखाई नहीं देता। इसके परिणामस्वरूप नई पीढ़ी कुंठा का शिकार हो रही है। दिल्ली जैसे महानगर में ही लगभग तीन लाख लोग नशे के जाल में छटपटा रहे हैं। अफीम, गांजा, चरस, स्मैक, हशीश, एल०एस०डी०, डैक्साड्रिन जैसे नशे समाज को दीमक की भाँति भीतर-ही-भीतर खोखला करते जा रहे हैं। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियाँ समान रूप से इनका शिकार हो रहे हैं।

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• नशे का रास्ता वह अँधेरा रास्ता है, जिस पर चलने वाला कभी उजाला नहीं पा सकता। देश में हालात भी कुछ ऐसे बन रहे हैं कि नशीली दवाओं की बिक्री हर गली-नुक्कड़ पर होने लगी है। आम धारणा के विपरीत यह विनाश सिर्फ समृद्ध और उच्च वर्ग के युवाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इनमें मजदूर, निम्न आय के लोग, तिपहिया स्कूटर व टैक्सी चालक, छोटे-छोटे दुकानदार, पान-सिगरेट बेचने वाले, स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी, बेरोजगार युवक, दफ्तर के क्लर्क, विद्यालयों व विश्वविद्यालयों के अध्यापक और यहाँ तक कि कुछ चिकित्सक भी शामिल हैं। 

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• परिभाषा की दृष्टि से मादक पदार्थ (ड्रग्स) वह पदार्थ है, जो शरीर की भौतिक व रासायनिक प्रक्रियाओं पर किसी - न -किसी रूप से प्रभाव डालता है। रुग्ण अवस्था में दी गई दवाएँ भी ड्रग्स ही हैं। लेकिन जब बिना डॉक्टरी सलाह से निरोग अवस्था में आदमी अपने मन, शरीर और व्यवहार में तबदीली लाने के लिए प्राकृत या रासायनिक पदार्थों का सेवन करता है, तो यह ड्रग्स का अवांछनीय सेवन कहलाता है। जब यही यदा-कदा का सेवन बढ़कर आदत का रूप ले लेता है और आदमी उसके बिना छटपटाहट महसूस करने लगता है; उसका शरीर इसकी नियमित माँग करने लगता है, तब यही नशे की लत कहलाती है। 

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• आज कई किस्म के मादक पदार्थ प्रचलन में हैं, जो शरीर और व्यवहार पर अपना अलग-अलग असर करते हैं। कुछ उत्तेजक किस्म के हैं; जैसे- कोकीन, डैक्सोड्रिन, मेथेड्रिन, बेंजेड्रिन आदि। कुछ अवसादक हैं; जैसे- अल्कोहल, चुरट, वेलियम व लिनियम जैसे ट्रेक्यूलाइज्ज़र (शांत करने की दवाएँ) और मेंड्रैक्स व डोरीडेन जैसी नशीली दवाएँ। तीसरा बड़ा वर्ग है- नारकोटिक्स यानी संवेदन मंदक और तंद्राकारी पदार्थों का। इनमें शामिल हैं- भांग, गांजा, चरस व हशीश। आखिरी बड़ा ग्रुप है- विभ्रम (हैलुसिनेसन) पैदा करने वाले मादक पदार्थों का; जैसे - एल० एस० डी० और पी० सी० पी०।

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• नशा करने वाले व्यक्ति के चाल - चलन , रहन - सहन और व्यवहार में काफी फर्क देखा जा सकता है। वह कामकाज और दूसरी सामाजिक गतिविधियों में दिलचस्पी गँवा बैठता है। उसे हर समय आलस्य घेरे रहता है और नींद आने में उसे कठिनाई महसूस होती है। इसके साथ ही उसे एक विचित्र किस्म की उदासी घेरे रहती है; वह बेचैन व थका हुआ दिखाई देता है। उसकी एकाग्रता भंग हो जाती है और स्मरण-शक्ति कमजोर पड़ जाती है। छोटी-छोटी बात पर झूठ बोलना उसकी आदत हो जाती है। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। पलभर में खिन्न हो उठना और लड़ पड़ना उसकी आदत बन जाती है। वह अपने मित्रों और सगे-संबंधियों से मुँह छिपाने लगता है तथा व्यक्तिगत स्वच्छता की तरफ से लापरवाह हो जाता है।

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• यदि यह लत स्कूल-कॉलेज के दिनों में लग जाए, तो वह प्रायः कक्षा से गायब रहने लगता है ,पढ़ाई-लिखाई से उसका ध्यान हट जाता है , खेल-कूद तथा दूसरी गतिविधियों में भी उसकी रुचि नहीं रहती। शारीरिक स्तर पर भी कई लक्षण देखे जा सकते हैं। उसकी भूख कम हो जाती है , वजन गिरने लगता है , चाल में लड़खड़ाहट आ जाती है , आँखें लाल और सूजी हुई दिखाई देती हैं , पुतली सिकुड़ सकती है , मुँह अधखुला रहता है; चेहरा और आँखें बिल्कुल सपाट व उगलियों पर जलने के निशान हो सकते हैं। यदि वह टीकों द्वारा नशीली दवाएँ ले रहा हो, तो शरीर में उन तमाम स्थानों पर टीकों के निशान और कपड़ों पर खून के धब्बे देखे जा सकते हैं। कै होना, शरीर में दर्द रहना आदि लक्षण भी देखे जा सकते हैं। साथ ही शौच में उसे काफी समय लगता है। जुबान में लड़खड़ाहट आ सकती है और शरीर में झटके लगने भी शुरू हो सकते हैं। यदि उसे समय से नशे की खुराक नहीं मिलती, तो उसमें निराशा के लक्षण देखे जा सकते हैं। उस दौरान मरीज बुरी तरह छटपटाने लगता है , शरीर की माँसपेशियों में ऐंठन आ जाती है। वह इतना बेचैन हो उठता है कि नशे की खुराक पाने के लिए वह कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है। चोरी, उठाईगीरी, घर का सामान बेच देना, कर्ज ले लेना आदि उसके लिए मामूली-सी बात बन जाती है। वह किसी की भी भावनाओं की परवाह नहीं करता।

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• नशेबाज कुपोषण का शिकार हो जाता है, जिससे टी०बी० और दूसरे संक्रामक रोग होने की आशंका बढ़ जाती है। ओवरडोज़ घातक बन सकती है और नशे की अवस्था में दुर्घटना होने की आशंका भी बनी रहती है। वह डिप्रेशन और दूसरे मनोरोगों से भी ग्रस्त हो जाता है। ऐसे लोगों में आत्महत्या की घटनाएँ भी देखी गई हैं। पारिवारिक व सामाजिक संबंधों में बिखराव आना, मार-पीट पर उतर आना, दांपत्य संबंधों में आई दरार से तलाक हो जाना, मित्रों का साथ छूट जाना, नौकरी से हटा दिया जाना जैसी समस्याओं के आने से उनका जीवन बिल्कुल टूट जाता है। इस पर आर्थिक समस्याएँ दिनों-दिन बढ़ती जाती हैं। पुरुषों में नशीली दवाओं का सेवन नपुंसकता भी पैदा कर सकता है। इंजेक्शन द्वारा नशा करने वाले लोगों में पीलिया और एड्स जैसे घातक संक्रामक रोग होने की आशंका भी बनी रहती है। कुल मिलाकर जीवन बिल्कुल अंधकारमय हो जाता है। नशा करने वाले का शीघ्रातिशीघ्र इलाज करवाया जाना चाहिए। मनोचिकित्सक की सहायता से उसे समझाया जाना चाहिए। सरकार तथा सामाजिक संस्थाओं ने नशा उन्मूलन के लिए अनेक प्रयास किए हैं, पर ये प्रयास अभी पर्याप्त नहीं हैं। रेडियो, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं आदि के माध्यम से इसके विरोध में प्रचार किया जाना चाहिए ताकि युवा वर्ग इसकी हानियों के प्रति सचेत हो सके। इसका उन्मूलन सम्मिलित प्रयासों से ही संभव हो सकता है।

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