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कक्षा -8 दीपकम् तृतीयः पाठ: सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरू

कक्षा -8 दीपकम्   तृतीयः पाठ:  सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरू शब्दार्था:  सरलार्था:  अभ्यासकार्यम् www.rajeshrastravadi.in     सुभाषितरसं...

कक्षा -8 दीपकम्  

तृतीयः पाठ: 

सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरू

शब्दार्था: 

सरलार्था: 

अभ्यासकार्यम्

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सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरू

शब्दार्थाः - पितामहि - हे दादी। नूतनाम् - नवीन। कथयतु - कहिए। शृणु- सुनो। निर्माणाय – निर्माण के लिए। समृद्धये - समृद्धि के लिए। बहून् - अनेक । सुखमयम् - सुखी। वत्से- पुत्री। शृणोषि - सुनती है। अद्य – आज । सुभाषितानि - सुंदर वचन। सुष्ठु - सुंदर। हिताय - कल्याण के लिए। अकर्त्तव्य-न करने योग्य । पठित्वा – पढ़कर। अवगच्छन्तु – जान लो।

सरलार्थ-

- हे दादी जी! एक नवीन कथा कहिए।

- पुत्री ! तुम प्रतिदिन तो कथा सुनती हो, आज नीतिश्लोकों को सुनो।

- नीतिश्लोक ......?

- हाँ, नीतिश्लोक। नीतिश्लोक नाम सुभाषित।

- सुभाषित क्या है ?

- अच्छी प्रकार कहे गए सुभाषित अर्थात् सुन्दर वचन। वे सदा लोगों के हित के लिए होते हैं।

- सुभाषितों के पठन से क्या लाभ है ?

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- सुभाषितों के पढ़ने से आदर्श मानव जीवन के निर्माण के लिए प्रेरणा प्राप्त होती है। मानव जीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों के पढ़ने की आवश्यकता होती है जो सुभाषितों को पढ़कर कार्यक्षेत्र में उनके ज्ञान का प्रयोग करता है, वह अनेक लाभों को प्राप्त करता है।

- अहो, सुंदर है। यदि ऐसा है तो मैं अवश्य सुभाषित पढ़ेंगी। सुभाषित अपने कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य के विषय में स्पष्टता से मार्गदर्शन करते हैं। इसलिए सभी अवश्य सुभाषित पढ़ें। उन्हें पढ़कर सभी जीवन के रहस्य को जान लो और जीवन को सुखी करो।

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                         सुभाषित - 1

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥१ ॥

शब्दार्थाः - गायन्ति - गाते हैं। किल अवश्य। धन्याः – धन्य।आस्पद - स्थान। भूयः पुनः। सुरत्वात् - देव होना। अपवर्ग - मोक्ष ।

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सरलार्थ :-भारत भूमि खण्ड में (जो लोग) होते हैं, वे अवश्य धन्य हैं-ऐसा देवता लोग गीत गाते हैं। स्वर्ग और मोक्ष के आधारभूत (इस भारत भूमि पर) तो (देवता भी) देवता होने की अपेक्षा पुनः मनुष्य होना चाहते हैं।

                         सुभाषित - 2

गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।

पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥

शब्दार्थाः- गुणी-गुणवान। निर्गुणः- गुणहीन। वेत्ति जानता है।

बली - बलवान। पिकः कोयल। करी - हाथी। निर्बलः - बलहीन। वायस:  - कौआ । मूषकः- चूहा।

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सरलार्थ : - गुणवान् (व्यक्ति) गुण को जानता है तथा गुणहीन (गुण को) नहीं जानता है। बलवान् (व्यक्ति) बल को जानता है। बलहीन (बल को) नहीं जानता। कोयल वसंत के गुण को जानती है। कौआ (वसंत के गुण को) नहीं जानता है। हाथी सिंह के बल को (जानता है)। चूहा (सिंह के बल को) नहीं जानता है।

                           सुभाषित - 3

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥ 

शब्दार्थाः - नम्राः - झुके हुए। फलोद्गमैः – फल आने पर। दूरविलम्बिनः - नीचे लटकने वाले। घनाः – बादल। समृद्धिभिः - सम्पत्तियों के द्वारा। तरवः - वृक्ष। नवाम्बुभिः -नया जल आने से। अनुद्धताः- विनम्र। परोपकारिणाम् – परोपकारी लोगों की।

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सरलार्थ :- फल आने पर वृक्ष झुक जाते हैं। नया जल भर जाने से बादल नीचे लटक जाते हैं। सम्पत्तियों के द्वारा सज्जन लोग विनम्र हो जाते हैं। परोपकारी लोगों का यह ही स्वभाव है।

                            सुभाषित - 4

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥

शब्दार्थाः - यथा - जिस प्रकार। चतुर्भिः – चार के द्वारा। कनकम् - सोना। निघर्षणं - घर्षण। ताप - गर्मी, आग। ताडन – पीटना। कर्मणा - कर्म से। परीक्ष्यते – परखा जाता है। छेदन – काटना। शीलेन – आचरण।

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सरलार्थ :- जिस प्रकार घर्षण, छेदन, आग में तपाना और प्रहार – इन चार (विधियों) के द्वारा सोना परखा जाता है, उसी प्रकार कुल, आचरण, गुण और कर्म - इन चार के द्वारा पुरुष की परीक्षा की जाती है।

                             सुभाषित -  5

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।

पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥५॥

शब्दार्था : - अष्टौ – आठ। प्रज्ञा- विशेष ज्ञान। दमः – संयम।अबहुभाषिता – सीमित बोलना। दीपयन्ति - शोभित करते हैं। कौल्यम् - कुलीनता। श्रुतम् - वेद ज्ञान। यथाशक्ति - शक्ति के अनुसार।

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सरलार्थ :- व्यक्ति को आठ गुण सुशोभित करते हैं-विशेष ज्ञान, कुलीनता, संयम, वेदशास्त्रों का ज्ञान, वीरता, संयमित वचन, शक्ति के अनुसार दान और कृतज्ञता।

                            सुभाषित -  6

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्। धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥ 

शब्दार्थाः - वृद्धाः - बूढ़े व्यक्ति । अभ्युपैति – प्राप्त होता है। छलम् - कपट।

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सरलार्थ :- वह सभा नहीं, जहाँ वृद्ध पुरुष न हों। वे वृद्ध नहीं जो धर्म की (बात) नहीं कहते हों। वह धर्म नहीं, जहाँ सत्य न हो। वह सत्य नहीं, जो कपट को प्राप्त करता है।

                            सुभाषित -  7

दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्। 

उष्णो दहति चाङ्‌ङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्॥

शब्दार्थाः - दुर्जनेन - दुष्ट के। सख्यम् - मित्रता। उष्णः- गर्म।अङ्गारः – अंगारा। कृष्णायते - काला करता है। समम् - साथ। कारयेत् - करे। दहति - जलाता है। शीतः – ठण्डा।करम् - हाथ को।

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सरलार्थ :- दुष्ट (व्यक्ति) के साथ मित्रता और प्रीति नहीं करनी चाहिए। गर्म अंगारा जला डालता है और ठण्डा (अंगारा) हाथ को काला कर देता है।

                            सुभाषित -  8

यथा होकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। 

एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥ 

शब्दार्थाः- यथा - जिस प्रकार । चक्रेण - पहिए से।

पुरुषकारेण – परिश्रम के। एकेन - एक से। दैवम्-भाग्य।

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सरलार्थ :- जिस प्रकार एक पहिए से रथ की गति नहीं होती है। उसी प्रकार उद्यम के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता है ।

प्रश्न-1. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत --

(क) गीतानि के गायन्ति?

(ख) कः बल न वेत्ति ?

(ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति ?

(घ) मूषकः कस्य बलं न वेत्ति ?

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(ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति?

(च) केन समं सख्यं न करणीयम् ?

(छ) केन विना दैवं न सिध्यति ?

उत्तराणि : --

(क) देवाः

(ख) निर्बलः

(ग) पिकः

(घ) सिंहस्य

(ङ) तरवः

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(च) दुर्जनेन

(छ) पुरुषकारेण।


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